Sunday, July 28, 2019

Aroh Chapter 1 Poetry आरोह प्रथम अध्याय काव्य भाग

विद्यार्थियों

आज हम आरोह पुस्तिका का प्रथम अध्याय काव्य भाग -
 क) आत्मपरिचय  ख) एक गीत (कवि: हरिवंश राय बच्चन) करेंगे |

आत्मपरिचय

                                              कविता का सार
आत्मपरिचय में कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपने प्रेममय व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला है | मैं
जीवन के कर्तव्यों और दायित्वों के प्रति सचेत जीवन के कष्टों के बीच भी प्रेम को जीवित रखे
हुए हैं | उसका हृदय किसी के प्रेम से झंकृत है | उसी प्रिया के स्नेह में डूबा रहता है | लोग तो
सामाजिक समस्याओं में उलझे रहते हैं, किंतु मैं अपने मन की भावनाओं में मग्न रहता है | उसे
प्रेम के बिना यह संसार अधूरा लगता है | इसलिए वह एक नए स्वप्निल संसार की खोज में
रहता है |

कभी अपने हृदय को प्रेम की अग्नि से प्रदीप्त रखता है | उसी आज के सहारे जीवन के सुख
दुख सहता है | उसके मन में यौवन का नशा है | नशे में वियोग और निराशा भी घिर आती है इस
कारण उसका मन रोता है, किंतु होठों पर फिर भी हंसी खेलती है | वह प्रेम -भरी यादों को
अपनी पूंजी मानता है | कभी दुनियादारी और स्वार्थ के लिए जीने वालों को नादान कहता है |
वे स्वयं ऐसे सांसारिक ज्ञान को भूलना चाहता है | वह भावनाओं के संसार में जीना चाहता है |
इसलिए मैं भावना और कल्पना के सारे रोज नई दुनिया बनाता है | उस में दोष पाए जाने पर
वह स्वयं भी उसे मिटा डालता है |

वह सांसारिक वैभव वाली दुनिया को ठोकर मारता है | कवि को अपने रुदन में भी संगीत सुनाई
पड़ता है | उसके कोमल पानी में विद्रोह की आग है उसका प्रेम चाहे खंडहर जैसा टूटा फूटा है |
वह फिर भी मैं उसके लिए राजाओं के महल से भी अधिक महत्वपूर्ण है | कभी करूदन ही उसकी
कविता में छंद बनकर फूटा है | मैं सचमुच एक दीवाना है | उसके गीतों में मादकता है | उसी
मादकता से सारे संसार में प्रेम की मस्ती घोल देना चाहता है | 

प्रश्न 1 - आशय स्पष्ट कीजिए- ‘’मैं और, और जग और, कहां का नाता |’’
उत्तर -
" मैं और, और जग और, कहां का नाता " प्रस्तुत पंक्ति से कवि का आशय यह है कि संसार से
उसका संबंध चिर स्थाई नहीं है संपूर्ण विश्व भौतिकता वादी मानसिकता से ग्रसित है जबकि उसे यह
वैभव एवं समृद्धि तुच्छ लगती है इन्हीं विचार अभिनेताओं के कारण उसे लगता है कि इस जग में और
इसमें कोई समानता नहीं है | दोनों एक दूसरे से भिन्न है |

प्रश्न 2 - आत्म परिचय पाठ में शीतल वाणी में आग होने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर -
वाणी भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम है भावों का आवास ह्रदय है भाव कोमल एवं कठोर दोनों प्रकार
के हो सकते हैं कभी शांत भाव से कविता कर रहा है पर उसके अंदर अत्यधिक वैचारिक उथल-पुथल
है उसमें पर्याप्त आग छिपी हुई है कभी के सामान्य शब्दों में भी शक्ति क्षमता क्रांति की आग व्याप्त है
वास्तव में वह अपनी शीतल वाणी में ही जनमानस के सोए हुए हृदय को जागृत करने की शक्ति रखता
है इसी भाव को व्यक्त करते हुए कभी कहता है कि शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूं ऐसा कहकर
कवि ने विरोधाभास अलंकार का प्रदर्शन किया है |

प्रश्न 3 - नादान वही है हाय जहां पर दाना आत्मपरिचय कविता में बच्चन के इस कथन का कारण
और आशय  बताइए |
उत्तर -
नादान यानी मूर्ख व्यक्ति सांसारिक माया जाल में उलझ जाता है | और दाना का अर्थ है- बुद्धिमान और
समझदार | व्यक्ति कभी कहता कि संसार में समझदार और नासमझ दोनों तरह के लोग रहते हैं | जो
प्रत्येक कार्य सोच समझकर करते हैं वे दाना कहलाते हैं | जो बिना सोचे समझे कार्य करते हैं वे नादान
कहलाते हैं | कवि ने दोनों में अंतर बताया है |

प्रश्न 4 - कविता का शीर्षक आत्मपरिचय क्यों रखा गया अर्थात आत्म परिचय कविता के शीर्षक
की सार्थकता स्पष्ट कीजिए |
उत्तर -
आत्मपरिचय कविता में कवि स्वयं की अस्मिता को इस दुनिया के सामने प्रकट कर रहा है | उसका
ह्रदय प्यार बांटता है और संसार फिर से उस पर कटाक्ष करता है | अतः वह अपने दिल में आग लिए
घूम रहा है | अपने मन की हर बात कभी स्पष्ट रूप से कह रहा है | वह अपने भग्न स्वप्नों का खंडहर
ढो रहा है | अपनी संपूर्ण मादकता को लेकर घूम रहा है | इस प्रकार कविता की एक-एक पंक्ति
उनका परिचय दे रही है | अतः आत्मपरिचय शिक्षक सर्वथा उचित एवं सार्थक है |

प्रश्न 5 - कविता एक और जग जीवन का भार लिए घूमने की बात करती है और दूसरी और मैं
जग का ध्यान किया करता हूं विपरीत से लगते इन कथनों का क्या आशय है?
उत्तर -
आत्मपरिचय कविता की प्रथम पंक्ति में कवि कहता कि मैं जग जीवन का भार लिए फिरता हूं और
आगे चलकर कहता है मैं कभी ना जग का ध्यान किए करता हूं दोनों कथनों में विरोधाभास है | दोनों में
विरोधाभास इस बात का परिचायक है कि संसार में हमारा नाता वास्तव में प्रीति और कलह का है |
संसार का भार हमारे मन मस्तिष्क पर निश्चित रूप से पड़ता है |

दुनिया अपने व्यंग बानो और अपने तौर तरीकों तथा शासन प्रशासन में चाहे जितना कष्ट दे किंतु
इस दुनिया से जुड़े रहना मनुष्य की मजबूरी है | अपने समाज में पूरी तरह कट कर मनुष्य नहीं रह सकता
क्योंकि यही हमारा उत्साह और हमारी अस्मिता है | हमारा सब कुछ है कभी संसार इक्ता की प्रवृतियां
और जगत के व्यवहार से उभरे कष्ट के बाद उससे मु क्ति की आकांक्षा भी पालता है |

एक गीत

                                              कविता का सार
दिन जल्दी जल्दी ढलता है” कवि हरिवंश राय बच्चन के कविता संग्रह, “निशा निमंत्रण” से उद्धृत है |
इस गीत में प्रकृति के नित्य परिवर्तन होते रूपों में मनुष्य के धड़कते हृदय को सुनने का प्रयास किया
गया है | किसी प्रिय आलंबन या विषय से साक्षात्कार होने की आशा हमारे प्रयासों को गति प्रदान
करती है | अन्यथा हमें शिथिलता आ जाती है | समय बीतते जाने का एहसास हमें लक्ष्य प्राप्ति के
लिए प्रयास करने के लिए प्रेरित करता है | अपने विचारों को स्पष्ट करने के लिए कभी ने दो दृष्टांत
दिए हैं |

मार्ग पर चलने वाला राही यह सोचकर जल्दी-जल्दी अपनी मंजिल की ओर कदम बढ़ाता है, कि
कहीं रास्ते में ही रात ना हो जाए | इस बात से उसमें थकान में भी उत्साह का संचार होता है | उसकी
मंजिल अब दूर नहीं रही | लक्ष्य प्राप्ति की आशा और बीच मार्ग में रात होने का भय, थके हुए राही
को जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है | पक्षियों को भी दिन बीतने के साथ एहसास
होता है, कि उनके बच्चे कुछ पाने की आशा में घोंसलो से झांक रहे होंगे | यह सोचकर उनके पंखों
में गति आ जाती है, ताकि वे जल्दी से अपने बच्चों से मिल सके | 

कवि की स्थिति पथिक और पक्षियों से विपरीत है, क्योंकि उससे मिलने को कोई व्याकुल नहीं है |
इसलिए उसे घर पहुंचने की भी कोई जल्दी नहीं है | जब हृदय में किसी प्रकार की आशा अथवा
उत्साह ना हो तो पैरों की गति में शिथिलता आ जाती है | कवि को न तो मार्ग में ही रात होने का
भय है, न लक्ष्य- प्राप्ति की चिंता ,इसलिए वह शिथिल है | किंतु फिर भी  कवि को लगता है कि
दिन बहुत जल्दी जल्दी बीत जाता है अर्थात जीवन में समय अत्यंत तेज गति से बीत जाता है |

प्रश्न 1 - दिन जल्दी जल्दी ढलता है कविता का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए |
उत्तर -
इस कविता में कवि में प्रेम की व्यग्रता और व्याकुलता को व्यक्त किया है पथिक को अपने प्रिय जनों
से जल्दी मिलने की इच्छा है | इसलिए वह जल्दी जल्दी चलने का प्रयास करता है इस प्रकार अपने
बच्चों को के विषय में सोच कर पक्षियों के  परों में गति आ जाती है | वह जल्दी-से-जल्दी अपने  नीड़ो
की ओर लौटना चाहते हैं जबकि कवि अकेला है किसी को उसकी प्रतीक्षा नहीं है इसीलिए कवि के
कदमों में शिथिलता तथा मन में व्याकुलता है यहां कवि मानता है कि जीवन की गति में तीव्रता का
कारण प्रेम है |

प्रश्न 2 - दिन जल्दी-जल्दी ढलता है कविता में कभी अपने घर की ओर लौटने में शिथिल और 
अनु उत्साहित क्यों है?
उत्तर -
कवि कहता है कि दिन ढलने पर जब वह घर की ओर कदम बढ़ाता है तो उसे यह देखकर सुखद
अनुभूति होती है कि अपने-अपने प्रतीक्षारत परिजनों से मिलने के लिए व्याकुल जीव थकावट के बावजूद
भी कितनी सुरती से घर की ओर जा रहा है उसके मन में विचार उठता है कि उसकी प्रतीक्षा तो कोई
नहीं करता उसके लिए तो कोई व्याकुल नहीं होता इस विचार के मन में आते ही उसकी गति शिथिल हो
जाती है और मैं धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए अपने घर की ओर अग्रसर होता है |

प्रश्न 3 - दिन जल्दी जल्दी ढलता है कि आवृत्ति से कविता की किस विशेषता का पता चलता है?
उत्तर -
रात के आगमन की अनुभूति से सभी पंथी अपने अपने घरों की ओर तेजी से लौट रहे हैं सभी के घरों में
उनका प्रतीक्षा के लिए कोई ना कोई अपना प्रिय जन यात्री भी व्याकुल रहता है कोई हमारी प्रतीक्षा कर
रहा है यही बात घर पहुंचने के लिए उनके कदमों की गति बढ़ा देती है लेकिन दुख की बात यह है कि
कवि के इंतजार में पलकें बिछाए कोई नहीं बैठा है यही तथ्य याद आने पर कवि की घर लौटने की
इच्छा शिथिल हो जाती है किसी का उसके प्रतीक्षारत ना होना उसे व्याकुल कर देता है |

प्रश्न 4 - बच्चे किस बात की आशा से नीडो से जाग रहे होंगे?
उत्तर -
बच्चे अर्थात चिड़िया के शिशु अपने चिड़िया के शिशु अपने नीडो से निकल कर अपने माता-पिता की
प्रतीक्षा करते हैं जो उनके लिए भोजन एवं स्नेह लेकर लौटते है | बच्चे आशावादी होते हैं वे दाना पाने
और अपनी मां के शीघ्र लौटाने की आस लिए नीडो से झांक रहे होंगे | वे सुबह से शाम तक आशा एवं
धैर्य के साथ अपने लिए स्नेह एवं भोजन की प्रतीक्षा करते हैं |

शुभकामनाओं सहित !

नीलम
35-मॉडल, चंडीगढ़ |

Aroh Chapter 2 Literature आरोह अध्याय दो गद्य भाग

विद्यार्थियों!

आज हम आरोह पुस्तिका का अध्याय दो गद्य भाग - बाजार दर्शन (लेखक: जैनेंद्र कुमार) करेंगे |


प्रश्न 1 - बाजार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या क्या असर पड़ता है? 
उत्तर -
बाजार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर निम्नलिखित असर पड़ता है:-
1. बाजार का जादू चढ़ने पर मनुष्य उसकी ओर उसी प्रकार से खिंचा चला जाता है जिस प्रकार
चुंबक लोहे की ओर खिंचा चला जाता है |
2. वह इन वस्तुओं को जरूरत ना होने पर भी खरीदने के लिए विवश होता है |
3. मनुष्य को सभी सामान जरूरी और आरामदायक प्रतीत होता है |
4. बस तुम्हें खरीदने पर उसका  मन संतुष्ट हो जाता है |
5. खरीदने के बाद उसे पता चलता है कि जो चीजें आराम के लिए खरीदी थी वह खलल डालती हैं |
6. उसे खरीदी हुई वस्तुएं अनावश्यक लगती हैं |
7. बहुतायत वस्तुएं खरीदने पर मनुष्य स्वयं को अपराधी महसूस करने लगता है |

प्रश्न 2 - बाजार का बाजारूपन क्या है ? पाठ के आधार पर समझाइए |
               अथवा
बाजारू पन से क्या तात्पर्य है किस प्रकार के व्यक्ति बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं
अथवा बाजार की सार्थकता किसमें है?
उत्तर -
कपट को बढ़ावा देना ही बाजारूपन का अर्थ है | इसके बढ़ने से परस्पर सद्भावना में कमी आ जाती है
इससे मनुष्य आपस में भाई-भाई, मित्र या पड़ोसी नहीं रह जाते | वे आपस में केवल ग्राहक और विक्रेता
की तरह ही व्यवहार करते हैं | इसमें एक की हानि में दूसरे को अपना लाभ दिखाई देता है | बाजारूपन
में शोषण अधिक और आवश्यकताओं का आदान-प्रदान कम होता है |

बाजार की सार्थकता लेखक के विचार में वे ही व्यक्ति बाजार को  सार्थकता प्रदान करते हैं जो
अपनी आवश्यकताओं को ठीक-ठीक समझ कर बाजार का उपयोग करते हैं यदि हम बाजार की चमक
दमक में फस कर रह गए तो वह असंतोष तृष्णा एवं ईर्ष्या से घायल कर बेकार बना डालती है की
सार्थकता भगत जी जैसे लोगों में ही है जिन्हें अपनी आवश्यकताओं का पूर्ण ज्ञान होता है |

प्रश्न 3 - बाजार के बाजार ओपन में बाजार ओपन बाजारू पन में परचेसिंग पावर की भूमिका को
स्पष्ट कीजिए
उत्तर -
परचेसिंग पावर’ का अर्थ है, पैसे की वह पावर जिससे आप कभी भी महंगी-से - महंगी वस्तुएं खरीद
सकते हैं | माल की संस्कृति, सामान्य बाजार और हाट की संस्कृति सभी परचेसिंग पावर से चलते हैं |  
माल की संस्कृति में लगभग सभी प्रकार की वस्तुएं एक ही स्थान पर उनकी कीमत में मिल जाती हैं |
ग्राहक भी धनाढ्य वर्ग के होते हैं | अतः महंगी कीमत पर भी सामान खरीदने को तैयार हो जाते हैं इसलिए
परचेसिंग पावर का असली रूप तो माल में ही दिखाई देता है |

प्रश्न 4 - बाजार दर्शन के आधार पर पैसे की व्यंग शक्ति को सोदाहरण समझाइए |
उत्तर -
पैसे की व्यंग शक्ति का मनुष्य की चेतना पर अवश्य ही कुछ ना कुछ असर पड़ता है जैसे व्यक्ति
सड़क पर चल रहा है और उसके आगे से धूल उड़ाती हुई मोटर निकल जाए तो वह सोचने लगता है काश
मैं भी अमीर मां-बाप के यहां पैदा होता तो मेरे पास भी मोटर गाड़ी होती अतः व्यक्ति पर पैसे की व्यंग
शक्ति का विशेष प्रभाव पड़ता है लेकिन भगत जी जैसे कुछ श्रेष्ठ विद्वानों पर पैसों की व्यंग शक्ति का
बिल्कुल असर नहीं होता |

प्रश्न 5 - लेखक ने अर्थशास्त्र को अनीति शास्त्र क्यों का है उदाहरण देकर समझाइए | 
उत्तर -
बाजार दर्शन पाठ का लेखक ऐसे अर्थशास्त्र को अनीति शास्त्र कहता है, जो बाजार के बाजार
ओपन को कपट को, लोभ-लालच को बढ़ावा देता है | लेखक इसका उदाहरण देते हुए कहते हैं कि कपट
की प्रवृत्ति को बढ़ाने का अर्थ है- परस्पर  सद्भाव की घटना | सद्भाव का ह्रास होने के कारण ही दो भाई
और दोस्त हिरदे पड़ोसी भी आपस में कोरे ग्राहक एवं दुकानदार की तरह व्यवहार करते हैं मानो दोनों एक
दूसरे को ठगने की घात में हूं एक की हानि में दूसरे को अपना लाभ दिखाई देता है | ऐसे बाजार में कपटी
सफल होते हैं और निष्कपट उसका शिकार हो जाते हैं |

प्रश्न 6 - बाजार जाते समय आपको किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए बाजार दर्शन पाठ के
आधार पर उत्तर दीजिए |
उत्तर -
बाजार जाते समय हमें तार्किक एवं बौद्धिक दृष्टिकोण रखना चाहिए अन्यथा अनावश्यक वस्तुओं की
खरीददारी की आशंका रहती है हमें अनावश्यक वस्तुओं की खरीदारी से बचना चाहिए इसके लिए हमें
निम्न बिंदुओं पर ध्यान देना चाहिए-
1. बाजार जाते समय परचेसिंग पावर के प्रति सतर्क रहना चाहिए प्राय पैसे की गर्मी के कारण हम
अनावश्यक वस्तुओं की खरीदारी कर लेते हैं | अतः इससे बचना चाहिए |
2. कई बार बाजार का आकर्षण रूप भी हमें अनावश्यक वस्तुओं को खरीदारी के लिए उत्तेजित करता है |
अतः इसके प्रति सतर्क रहना चाहिए |
3. बाजार जाते समय कभी भी मन को खाली नहीं रखना चाहिए बिना किसी लक्ष्य के बाजार जाने पर प्राय
अनेक वस्तुओं की चाहत हमें घेर लेती है, और इससे बचना चाहिए | अतः हमें खरीदारी के लिए तभी बाजार
जाना चाहिए जब हमें अपनी अवस्थाओं का पूर्ण ज्ञान हो | अन्यथा बाजार के जादू में फंसने की संभावना
बनी रहती है |
4. बाजार जाते समय जरूरत की वस्तुओं की सूची बनाकर अपने साथ लेकर जाएं और उसी दुकान पर
अपना सामान खरीदें |

प्रश्न 7 - बाजारवाद के इस युग में भगत जी जैसा दृष्टिकोण मार्गदर्शन करता है पक्ष और विपक्ष में
तर्क दीजिए |
उत्तर -
समझाने का प्रयत्न किया है कि किस तरह बाजार के जादू से बचा जा सकता है | बाजार में नकारात्मक
प्रभावों को उपभोक्ता भगत जी की तरह बेअसर कर सकता है | भगत जी पर बाजार की चकाचौंध अपना
प्रभाव नहीं डाल सकी | वह खुली आंख, तुष्ट मन और मग्न भाव से चौक बाजार से चले जाते हैं और
एक छोटी सी पंसारी की दुकान से अपनी अवस्था की चीजें केवल जीरा एवं नमक खरीदते हैं | उनके
लिए अपनी आवश्यकताएं बिल्कुल स्पष्ट है | बे बाजार में भटकते नहीं, वह उनके व्यक्तित्व का एक
सशक्त पक्ष है | उनका आचरण निश्चित रूप से बाजार में शांति स्थापित करने में मददगार हो सकता है |
ऐसा आचरण करने वाला व्यक्ति ही बाजार में से सच्चा लाभ उठा सकता है, और बाजार को सच्चा
लाभ दे भी सकता है | संयमित व्यवहार एवं सुस्थिर मानसिकता के बल पर ही आज का मनुष्य बाजार
के शोषण से मुक्त रह सकता है |

प्रश्न 8 - बाजार दर्शन निबंध उपभोक्तावाद एवं बाजारवाद की अंतर्वस्तु को समझने में बेजोड़ है
उदाहरण देकर इस कथन पर अपने विचार प्रस्तुत कीजिए |
उत्तर-
 ‘बाजार दर्शन’ निबंध में उपभोक्तावाद एवं बाजारवाद की अंतर्वस्तु को बेहतर ढंग से स्पष्ट किया
गया है | बाजार में दुकानदार किसी भी प्रकार से अपना सामान अधिक मात्रा में मनचाहे दाम पर बेचना
चाहते हैं | वे ग्राहक की तरह-तरह से लल चाहते हैं | ग्राहक बाजार में अनेक प्रकार की आकर्षण वस्तुएं
देखकर आकृष्ट हो जाते हैं और आवश्यकता ना होने पर भी अनेक वस्तुएं खरीद लेते हैं | लेखक के
शब्द में, ‘’बाजार है कि शैतान का जाल है ? ऐसा सजा सजा कर माल रखते हैं कि बेहया हो जो ना
फंसे’’ | लेखक बाजारवाद को स्पष्ट करते हुए कहता है- उच्च बाजार का आमंत्रण मुख होता है | उससे
चाहे जहां जगती है | जहां मतलब इच्छा यहां इसका अर्थ हुआ अभाव | चौक बाजार में खड़े होकर
आदमी को लगने लगता है उसके पास पर्याप्त चीजें नहीं है | और चाहिए और चाहिए और चाहिए |

प्रश्न 9 - बाजार दर्शन पाठ का संदेश अपने शब्दों में कीजिए |
उत्तर -
बाजार दर्शन पाठ के लेखक जैनेंद्र कुमार ने बाजार की जादुई ताकत से पाठकों को परिचित कराते
हुए उससे सतर्क रहने की आवश्यकता पर बल दिया है | लेकिन सर आज बाजार की चकाचौंध हमें
अपनी और अत्यधिक आकर्षित करती है, लेकिन लोगों को अपनी आवश्यकतानुसार ही चीजें खरीदनी
चाहिए | लोगों को सोच-समझकर बाजार का उपयोग करना चाहिए | भगत जी के माध्यम से लेखक
ने हमें यह भी बताया- जैनेंद्र जी ने इस महत्वपूर्ण निबंध में गहरी में चाचा रिक्ता एवं साहित्य सुन
ललिता का दुर्लभ संयोग है इस पाठ के माध्यम से जिनेंद्र स्पष्ट संदेश देना चाहते हैं कि बाजार की
अनावश्यक चमक-दमक में फंसने से असंतोष तृष्णा ईर्ष्या का शिकार होने की संभावना बढ़ जाती है |
और इस पाठ से उन्होंने यह संदेश इस संदेश को उन्होंने कहीं दार्शनिक अंदाज से व्यक्त किया |

प्रश्न 10 -  बाजार दर्शन पाठ के आधार पर बताइए कि पैसे की पावर का रस किन दो रूपों
में प्राप्त किया जाता है ?
उत्तर -
पैसे की पावर का असली रस ‘ परचेसिंग पावर’  में है | पैसे की पावर से खरीदे गए मकान संपत्ति
दूर से ही दिखाई पड़ते हैं | दूसरे, संयमी लोग पैसे की बचत करके पैसे की पावर का रस प्राप्त कर
लेते हैं | पैसा इकट्ठा होने पर हम आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग भी कर सकते हैं और हमें
किसी से मदद मांगने की भी जरूरत नहीं पड़ती |

शुभकामनाओं सहित !

नीलम
35-मॉडल, चंडीगढ़ |