Sunday, July 19, 2020

Vitan Chapter 3 Literature वितान अध्याय 3 गद्य भाग

विद्यार्थियों


आज हम वितान पुस्तिका का अध्याय 3 - अतीत में दबे पाव (लेखक - ओम थानवी) करेंगे |

सार
अखंड भारत में बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में प्राचीन सभ्यता की खोज में दो स्थानों पर खुदाई
का कार्य किया गया था | वर्तमान समय में यह दोनों स्थान पाकिस्तान के अंतर्गत हैं | पाकिस्तान के
सिंध प्रांत में मोहनजोदाड़ो और पंजाब प्रांत में हड़प्पा नाम के दो नगरों का पुरातत्विक क्षेत्र के विद्वानों
ने खुदाई के बाद सिंधु घाटी की सभ्यता का पता लगाया | 

मोहनजोदाड़ो का परिचय - मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा संसार की प्राचीनतम नियोजित शहर में माने
जाते हैं | मोहनजोदाड़ो का अर्थ मुर्दों का टीला है | यह नगर मानव- निर्मित, छोटे-मोटे टीलो पर आबाद
था | इस नगर की सभ्यता के नष्ट होने के बाद उसे यह नाम मिला | सिंधु घाटी सभ्यता के परिपक्व
दौर का सबसे उत्कृष्ट नगर है | खुदाई के बाद इस नगर में बड़ी तादाद में इमारतें, सड़कें, धातु-पत्थर
की मूर्तियां, चौक पर बने चित्रित भांडे, मोहरे, साजो समान और खिलौने आदि मिले हैं | मोहनजोदाड़ो
अपने दौर में सभ्यता का केंद्र था | संभवत यह इस क्षेत्र की राजधानी था | यह शहर 200 हेक्टेयर में
फैला था | 5000 वर्ष पूर्व यह एक महानगर था | इस नगर से सैकड़ों मील दूर हड़प्पा नामक नगर था,
जिसके साक्ष्य रेल लाइन बिछाने के समय नष्ट हो गए थे |

नगर- रचना - यह नगर मैदान में नहीं है अपितु एक टीले पर बसा था यह पीले प्राकृतिक नहीं, अब 
मानव-निर्मित है | इन भी कच्ची- पक्की ईटो से धरती की सतह को ऊंचा उठाया गया है | यह कार्य
सिंधु के पानी से बचाव के लिए किया गया था | यह नगर भले ही आज खंडवा में बदल गया है, किंतु
इसके स्वरूप का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है | यह नगर भले ही आज खंडहरों में बदल
गया, किंतु इसके स्वरूप का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है, कि इस की गलियाँ, सड़कें,
कमरे, रसोई, खिड़की, चबूतरे, आंगन, सीढ़ियां आदि इस नगर के सुंदर नियोजन की कहानी स्वतः ही
कह देते हैं | यहां की सभी सड़कें सीधी या ऑडी हैं | आज के वस्तु कार से ग्रिड प्लान कहते हैं | पर
बने बौद्ध स्तूप के पीछे गढ़ और ठीक सामने वर्ग की बस्ती है | उसके पीछे 5 किलोमीटर सिंधु नदी
बहती है | दक्षिण में कामगारों की बस्ती है | नगर में 40 फुट लंबा और 25 फुट चौड़ा एक तालाब है,
जिसे महा कुंड नाम दिया है | महा कुंड की गहराई 7 फुट कुंड में उत्तर और दक्षिण में सीढ़ियां उतरते हैं | 
उत्तर दिशा में आठ स्नानघर है, जिनमें किसी का भी द्वार एक दूसरे के सामने नहीं खुलता | तीन और
साधुओं के कक्ष उस काल की सिद्ध वास्तुकला का यह भी एक नमूना है | कुंड का तेल और दीवारें चुने
और पक्की ईंटों से बनाए गए हैं | कुंड में बाहर के अशुद्ध पानी को ना आने देने का ध्यान रखा गया है |
कुंड में पानी की व्यवस्था के लिए एक तरफ कुआं है और कुआं भी दोहरे घेरे वाला है | कुंड के पानी का
बाहर निकलने के लिए नालियां है और नालियां पक्की बनाई गई हैं और उनको ढका भी हुआ है | निकासी
की ऐसी सुव्यवस्थित व्यवस्था इससे पहले की  इतिहास में नहीं मिलती | 

बौद्ध स्तूप - मोहनजोदड़ो सभ्यता के बिखरने के बाद एक जीर्ण शीर्ण किले के सबसे ऊंचे चबूतरे पर
एक बड़ा सा बौद्ध स्तूप है | यह तू 25-फुट ऊंचे चबूतरे पर है और इसका निर्माण का लगभग 26 वर्ष
पूर्व का है | चबूतरे पर भिक्षुओं  के कमरे भी हैं | इस खुदाई के बाद ही भारत की सभ्यता की गणना मिस्र
और इराक (मेसोपोटामिया) की प्राचीन सभ्यता के साथ होने लगी है | यह बौद्ध स्तूप भारत का सबसे
पुराना लैंडस्केप है | इसको देखकर दर्शक रोमांचित हो उठता है | इतना प्राचीन स्तूप ना जाने कितनी
सभ्यताओं का साक्षी है | यह स्तूप वाला हिस्सा मोहनजोदाड़ो के सबसे खास हिस्से के एक सिरे पर स्थित
है | इस  भाग को पुरातत्व के विद्वान गढ़ कहते हैं | मोहनजोदाड़ो में यह अकेली इमारत है, जो अपने मूल
स्वरूप के बहुत ही नज़दीक बची रही |

सिंधु घाटी की खेती एवं व्यापार - सिंधु घाटी में व्यापार के साथ उन्नत खेती भी थी | यह खेतिहर और
पशु पालक सभ्यता थी | यहां ज्वार बाजरा रागी की उपज होती थी | खजूर, खरबूजे और अंगूर भी होते थे | 
कपास की खेती भी होती थी | मोहनजोदाड़ो में सूट की कटाई- कढ़ाई बुनाई के साथ रंगाई भी होती थी |
रंगाई का एक छोटा सा कारखाना भी खुदाई में मिला है | यह सभ्यता  उन सुमेर में आयात करती थी, और
सूती कपड़ा निर्यात करती थी | इस सभ्यता को तांबे का ज्ञान भी था | सिंधु में पत्थर था राजस्थान में तांबे
की कहानी थी | इनके ही उपकरण खेती-बाड़ी में काम आते थे | वहां रबी की फसल कपास, गेहूं, जौ, सरसों 
और चने की उपज के  तो पुख्ता प्रमाण मिले हैं | 

महा कुंड के आसपास के भवन - महा कुंड के उत्तर पूर्व में एक बहुत लंबी सी इमारत के अवशेष हैं | जिसमें
दलान बरामदे छोटे छोटे कमरे बने हुए दक्षिण में भी भगन इमारत है | जिसमें 20 खंबों वाला एक बड़ा हाल है |
यह संभवत राज्य सचिवालय, सभा भवन या कोई सामुदायिक केंद्र रहा होगा | मोहनजोदाड़ो की खुदाई करने
वाले पुरातत्व विभाग के  नाम से संक्षिप्त मोहल्ले बन गए-जैसे डीके हल्का, और डीके जी  हल्का | 

डीके हल्का - डीके के नाम पर दो हल्के हैं | डीके हल्का सबसे महत्वपूर्ण है | शहर की मुख्य सड़क यहीं
पर है | यह बहुत लंबी सड़क है | अब तो आधा मिल ही बची है इसकी चौड़ाई 33 फुट है | इस सड़क के
दोनों ओर घर है | किंतु किसी भी घर का दरवाज़ा सड़क की ओर नहीं है | उनके दरवाज़े अंदर गली में है |
मुख्य सड़क की ओर पीठ है | किसी के घर जाने के लिए पहले मुख्य सड़क से सेक्टर की गली में जाना
पड़ता है | सड़क के दोनों तरफ समांतर ढकी हुई गलियाँ है | हर घर में स्नान घर है खुली नालियां बस्ती में
भी नहीं है | घर का पानी पहले घर की हाउदी में आता है, फिर सड़क की नाली में बस्ती के भीतर 9 से 12
फुट चौड़ी सड़क है | बस्ती में कुएँ भी हैं | पूरे मोहनजोदाड़ो में लगभग 700 कुएँ हैं | सिंधु घाटी की सभ्यता
नदी, कुएँ, कुंड, स्नानागार और बेजोड़ पानी निकासी के कारण जल संस्कृति कही जा सकती है |

डीके जी हल्का - बड़ी बस्ती में पुरातत्व शास्त्री काशीनाथ दीक्षित के नाम पर एक हल्का डीकेजी कहलाता
है | यहां घरों की दीवारें उनकी और मोटी है | शायद यहां दो मंजिले मकान रहे हो | कुछ दीवारों में छेद है |
सभी घर एक अनुपात 2 अनुपात 4 की  भट्टी की  पक्की ईंटों से बने हैं  यहां पत्थर का प्रयोग नगण्य है 
छोटे- बड़े सब घर एक पंक्ति में हैं | अधिकतर 30 x30 फुट के हैं | कुछ इनसे दुगने व तिगने आकार के
भीहैं | लेकिन है, सभी एक जैसे | एक घर मुखिया का घर कहलाता है, इसमें दो आंगन और 20 कमरे हैं |
बड़े घरों में ऊपर की मंजिल के निशान है | बड़े छोटे सभी घरों में कमरों का आकार प्राय छोटा है | जिसे
अनुमान लगाया जाता है कि शहर की आबादी ज्यादा नहीं रही होगी | छोटे कमरों में छोटी संक्री सीढ़ियां
हैं जिनके पायदान  ऊंचे हैं | शायद यह  जमीन कीतंगी के कारण हो | नहर के चिन्ह नहीं मिले हैं लगता है | 

राजस्थान की याद - मोहनजोदड़ो की गलियों में घरों को देखकर लेखक को राजस्थान याद आता है |
ज्वार, बाजरे की खेती व, बेर तो समानता के कारण है | इसके अतिरिक्त जैसलमेर का कुलधरा गांव भी
मोहनजोदड़ो की याद दिलाता है | उस गांव के  निवासी अपने राजा से तकरार के कारण सारा गांव खाली
करके चले गए थे | पीले पत्थरों से बना यह सुंदर गांव अपने बाशिंदों की मानो प्रतीक्षा कर रहा है | राजस्थान
के समान ही गुजरात, पंजाब और हरियाणा में भी कुएं, कुंड  कच्ची- पक्की ईंटों के कई घर आज भी वैसे
मिलते हैं, जैसे हजारों साल पहले हुए हो | 

जॉन मार्शल की पुस्तक - जॉन मार्शल ने मोहनजोदड़ो पर तीन खंडों का एक बहुत बड़ा प्रबंध छुपाया है |
उसमें सिंधु घाटी से 100 वर्ष पहले प्रयोग होने तथा खुदाई में मिली तो पहियों वाली गाड़ी-दोनों के चित्र
है | इन चित्रों के माध्यम से उन्होंने परंपरा को सिद्ध किया है | बैलगाड़ी में अरे वाले पहिए परिवर्तित है |
अब तो  जीप के उतरे हुए पहिए भी काम आने लगे हैं | ऊंट गाड़ी में हवाई जहाज के उतरे  पहिए काम कर
रहे हैं | 

मोहनजोदाड़ो का अजायबघर - साबुत इमारत में अजायबघर हैं या किसी कस्बाई स्कूल की छोटी इमारत 
जैसा है | अजायबघर छोटा है | समान भी ज्यादा नहीं है | अहम चीजें कराची, लाहौर, दिल्ली और लंदन में
है, या अकेले मोहनजोदाड़ो की खुदाई में निकली पंजीकृत चीजों की संख्या 50 हजार से ज्यादा है | मगर
जो मुट्ठी भर चीजें यहां प्रदर्शित हैं | पहुंची हुई सिंधु घाटी सभ्यता की झलक दिखाने को काफी है | काला पड़
गया गेहूं, तांबे और कांसे के बर्तन, मोहरे, वाद्य, चाक पर बने विशाल बर्तन, उन पर काले भूरे चित्र, चौपड़ की
गोटियां, दिए माप तोल पत्थर, तांबे का आईना, मिट्टी की बैलगाड़ी और दूसरे खिलौने, दो पाटों वाली चक्की,
कंगी, मिट्टी के कगन, रंग-बिरंगे पत्रों के मनको वाले हार, पत्थर के औजार आदि कुछ सोने के गहने भी यहां
हुआ करते थे, जो कि चोरी हो गए हैं | 

मोहनजोदाड़ो हड़प्पा सभ्यता - संस्कृति में ना भव्य राज प्रसाद हैं, ना मंदिर और ना राजाओ, महंतों की
समाधिया, मूर्ति शिल्प भी छोटे हैं | नरेश यानी राजा के मुकुट भी छोटे हैं ना में भी छोटी है यह लोग लघुता में
मेहता अनुभव करते थे | मोहन जोदड़ो सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा नगर था साधनों और व्यवस्थाओं के
लिहाज से समृद्ध बीता इसमें भव्य व आडंबर का भाव रहा है | इस सभ्यता की अधिक चर्चा ना होने के कारण
इसकी अभी तक पढ़ी जाने वाली लिपि भी है | सिंधु घाटी की सभ्यता के बारे में लेखक लिखता है - सिंधु
घाटी के लोगों में कला या सुरुचि का महत्व ज्यादा था | वस्तु कलाइयां नगर नियोजन ही नहीं धातु, पत्थर
की मूर्तियां,मृदभांड, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति और पशु पक्षियों की छवियां, निर्मित मोहरे, उन पर
बारीकी से उत्तीर्ण आकृतियां, खिलौने, भूषण और सबसे ऊपर  सुघड़ अक्षरों का लिपि रूप सिंधु घाटी 
को तकनीक-फिर से ज्यादा कला-सिद्ध जाहिर करता है | एक पुरातत्ववेता के मुताबिक सिंधु घाटी की
सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य बोध है, “जो राज पोषित या धर्म पोषित ना होकर समाज पोषित था
शायद इसलिए आकार की भव्यता की जगह उसमें कला की भव्यता दिखाई देती है | 

समापन - सिंधु के पानी के रिसाव के कारण मोहनजोदाड़ो की खुदाई का काम बंद कर दिया गया | पानी
के रिसाव से क्षार और दल दल की समस्या पैदा हो गई | अब तो इन खंडहरों को बचाना भी एक समस्या है |

प्रश्न 1 - सिंधु-सभ्यता साधन- संपन्न पर उसमें भव्यता का  आडंबर नहीं था | कैसे?
उत्तर -

सिंधु घाटी- सभ्यता साधन संपन्न थी, यह बात उस सभ्यता के भव्य खंडहरों से सिद्ध होती है | स्नानागार, 
मृदभंडारों कुओं-तालाबों, गली-सड़क व्यवस्था तथा जल निकासी की  ढकी हुई नालियां | उनके शानदार
रहन सहन और उन्नत जीवन शैली पर प्रकाश डालती हैं और बताते हैं, कि वे लोग साधन संपन्न थे | उनकी
जीवनशैली बड़ी सादगी से भरी थी | उसमें दिखावा आडंबर नहीं था | वे अनुशासित थे, पर ताकत के बल
पर नहीं | उनकी खूबी उनका सौंदर्य बोध था, जो राज-पोषित या धर्म-पोषित ना होकर समाज -पोषित था | 
खुदाई में प्राप्त  वस्तुओं से यह सिद्ध हो जाता है कि सिंधु-सभ्यता उच्च विकसित साधन-संपन्न सभ्यता थी |
उनके घर उनकी जरूरत के अनुसार थे | उनमें कहीं भी अनावश्यक विस्तार और दिखावटी पन नहीं था |

प्रश्न 2 - सिंधु-सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है जो राज पोषित या धर्म पोषित ना होकर
समाज-पोषित था, ऐसा क्यों कहा गया?
उत्तर -
मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा तक समूची सभ्यता में कहीं हथियार नहीं मिले, जो किसी राजतंत्र में होते हैं | 
वह अनुशासन अवश्य था पर ताकत के बल पर नहीं | वहां शायद कोई सेना-संस्था नहीं थी | परंतु कोई
अनुशासन अवश्य या जो नगर योजना, वास्तुशिल्प, मोहरों, पानी या साफ-सफाई जैसी सामाजिक
व्यवस्थाओं में आदि में एकरूपता स्थापित किए हुए था | यही बात इसे दूसरी सभ्यताओं से अलग करती है |
यहां पर राज तंत्र, धर्म तंत्र की शक्ति का प्रदर्शन करने वाले महत्व, उपासना स्थल, मूर्तियां और पिरामिड
आदि नहीं मिलते हैं | ना राजाओ, महंतों की समाधि है | यह सभ्यता ताकत के बल पर ना होकर आपसी
समझ पर आधारित थी | सिंधु घाटी के लोगों में कला या सुरुचि का महत्व अधिक था |

वस्तु कला नगर नियोजन ही नहीं, और पत्थर की मूर्तियां, मृदुभांड, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति और
पशु पक्षियों की छवियां, पत्तियों की छवियां, सु निर्मित मोहरे, उन पर बारीकी से चित्रित आकृतियां, खिलौने, 
केश विन्यास, भूषण और सबसे ऊपर सुपर अक्षरों का लिपि रूप आदि सिंधु सभ्यता को तकनीक सिद्ध से
अधिक कला सिद्ध व्यक्त करता है | इससे सिद्ध होता है कि सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है जो
राज-पोषित या धर्म-पोषित न  होकर समाज पोषित था | संभवत इसलिए आकार की भव्यता के स्थान पर
उसमें कला तथा उपयोगिता की भव्यता दिखाई देती है | सिंधु घाटी का समाज राज-तंत्र अथवा धर्म- तंत्र
की बल्कि उपेक्षा व स्वानुशासित था | समाज में सौंदर्य बोध था | किंतु कोई राजनीतिक या धार्मिक आडंबर
नहीं था | इसलिए यह कहा गया कि सिंधु घाटी की खूबी उसका सौंदर्य बोध है जो राज-पोषित या धर्म-पोषित
ना होकर समाज-पोषित था |

प्रश्न 3 - पुरातत्व के किन चिन्हों के आधार पर आप यह कह सकते हैं, कि -
सिंधु-सभ्यता  ताकत से शासित होने की अपेक्षा समझ से अनुशासित सभ्यता थी|
उत्तर -
मोहनजोदाड़ो के अजायबघर में प्रदर्शित वस्तुओं में कलाकृतियां है | उजार हैं किंतु कोई हथियार नहीं है |
मोहनजोदाड़ो क्या हड़प्पा से लेकर हरियाणा तक समूची सिंधु सभ्यता में हथियार उस तरह कहीं नहीं मिले |
जैसे किसी राज तंत्र में होते हैं | यदि सभ्यता में कोई शक्ति केंद्र होता तो उसके चित्र मिलते | इनके तो नरेश
के सिर पर मुकुट भी बहुत छोटा सा है | राज महल नहीं, मंदिर नहीं, समाधि नहीं | इससे यह अर्थ निकलता
है कि इस सभ्यता में सत्ता का कोई केंद्र नहीं था | अनुशासन स्वयं का था ताकत के बल पर आधारित नहीं था |
इन आधारों पर ही पुरातत्वविद यह मानते हैं कि कोई सैन्य सत्ता शायद यहां न रही हो | इस समाज में एकरूपता
थी | सभी नागरिक अपनी समझ से अनुशासित थे |

प्रश्न 4-  टूटे-फूटे खंडहर, सभ्यता और संस्कृति इतिहास के साथ-साथ धड़कती जिंदगी यों के अनछुए
समयो का भी दस्तावेज़ होते हैं - इस वर्णन कथन का भाव स्पष्ट कीजिए? 
उत्तर - 
मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा जैसे नगरों के खंडहर तत्कालीन सभ्यता और संस्कृति तथा इतिहास के प्रभाव के
रूप में देखे जाते हैं | परंतु यह खंडहर केवल इतिहास मात्र नहीं है, अपितु भी हमारा ध्यान उस ओर खींचते हैं |
जब लोग इन घरों में रहते होंगे और उन में जनजीवन गूंजता होगा | इन खंडहरों के आधार पर तत्कालीन जन
जीवन उनके रहन-सहन, अनुभव, सोच विचार आदि के संबंध पर भी प्रकाश पड़ता है | इन  खंडहरों को देखकर
तत्कालीन सामाजिक जीवन की कल्पना भी की जा सकती है | और यह प्राचीन सभ्यता के ठोस प्रमाण है |

प्रश्न 5 - सिंधु घाटी सभ्यता को जल संस्कृति कह सकते हैं ? कारण सहित उत्तर दीजिए | 
उत्तर -
नदी, कुएँ, स्नानागार और बेजोड़ जल निकासी व्यवस्था को देखते हुए सिंधु घाटी सभ्यता को जल संस्कृति
कहा जा सकता है | सिंधु घाटी सभ्यता में सामूहिक स्नान के लिए बने स्नानागार उत्कृष्ट वास्तुकला के उदाहरण
होने के साथ-साथ तत्कालीन जल प्रबंधन की उत्कृष्टता को भी दर्शाते हैं | एक पंक्ति में 8  स्नानघर हैं, जिनमें
से किसी का भी द्वार एक दूसरे के सामने नहीं खुलता है | पानी के जमाव वाले कुंड के तल में तथा दीवारों पर
ईटों के बीच चूने और  चिराड़ी गारे का प्रयोग किया हुआ है | जिससे कुंड का पानी रिस कर बाहर ना आ सके
और बाहर का अशुद्ध पानी कुंड में ना जा सके | सिंधु सभ्यता के नगरों में सड़कों के साथ बनी हुई नालियां
पक्की इंटों की बनी हुई हैं, और ढकी हुई है | पीने के पानी के लिए नगर में लगभग 700 कुए थे | मोहनजोदाड़ो
के निकट ही सिंधु नदी भी बहती थी | मोहनजोदाड़ो में जितने भी घर थे सभी मकानों में अलग-अलग स्नानघर भी थे |

प्रश्न 6 - मोहनजोदाड़ो की नगर योजना आज की सेक्टर, मार्क-कॉलोनियों के नियोजन से किस
प्रकार बेहतर थी पाठ अतीत में दबे पांव के आधार पर स्पष्ट कीजिए |
उत्तर -
मोहनजोदाड़ो की नगर योजना वास्तव में आज की सेक्टर मार्क कॉलोनियों के नियोजन से अधिक बेहतर थी | 
मोहनजोदाड़ो छोटे-मोटे किलो पर आबाद था | यह  टीले प्राकृतिक नहीं थे | कच्ची और पक्की दोनों तरह की
ईटों से धरती की सतह को ऊंचा उठाया गया था | ताकि सिंधु नदी का पानी बाहर फैल जाए, तो उससे बचा
जा सके | मोहनजोदाड़ो की सड़कें चौड़ी थी | यहां की सड़कें सीधी या ऑडी भी थी | मोहनजोदाड़ो की जल
निकासी का प्रबंध इतना उन्नत था, कि आज के वास्तुकार भी उसे देखकर सोच में पड़ जाते हैं | नगर की
योजना अत्यंत सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक रूप से तार्किक थी | घरों की बनावट हो या सार्वजनिक स्थानों की
योजना, सभी में तार्किक सुव्यवस्था थी | इस शहर में उच्च वर्ग की बस्ती, स्नानागार, ढकी नालियां, पानी की
निकासी की व्यवस्था, सभा भवन, घर की बनावट आदि देकर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है, कि यहां की
नगर योजना अतुलनीय थी |

प्रश्न 7 - सिंधु घाटी की सभ्यता केवल अवशेषों के धार पर बनाई गई एक धारणा है अतीत में दबे
पांव पाठ के आधार पर इसके पक्ष या विपक्ष में अपने विचार प्रस्तुत करें |
उत्तर -
पक्ष - सिंधु सभ्यता साधन संपन्न थी | यहां पर साधनों की कमी नहीं थी | सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों
के आधार पर ही इसकी नगर योजना, कृषि, संस्कृति और कला आदि के बारे में बताया जा सकता है |
अवशेषों में कोई लिखित प्रमाण नहीं मिले हैं, और इतनी पुरानी सभ्यताओं के लिखित प्रमाण संभव होते भी
नहीं है जो चित्र लिपि यहां से मिली है | उसका अध्ययन करना भी अत्यंत कठिन है | इस कारण केवल
अवशेषों को ही प्रमाण माना जाता है | यह विशेष मनुष्यों द्वारा बनाए गए हैं ,जो इतने समय के बाद भी
अभी तक उपलब्ध हैं | सिंधु घाटी में  ईटों, मूर्तियों,  भवनों  आदि के अवशेष मिलते हैं | इन प्रमाण  के
कारण संपूर्ण सभ्यता व संस्कृति की सुंदर कल्पना की  गई है | वस्तुत यह एक प्रकार की धारणा ही है |
सिंधु घाटी की सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य बोध है ,जो वस्तु जिस प्रकार सुंदर लग रही थी | उसका
उस प्रकार से उपयोग किया गया था | 

विपक्ष - सिंधु घाटी सभ्यता को अवशेषों के आधार पर निर्मित एक धारना मानना अनुचित  है | वर्ष 1922
में रखाल दास बनर्जी द्वारा मोहनजोदाड़ो में खुदाई करने से प्राप्त अवशेषों से इस सभ्यता के दावे को
वैज्ञानिक आधार प्रदान किया था | इसके पश्चात काशीनाथ दीक्षित, हेराल्ड हरग्रीव्स, शिरौन  रत्नाकर
आदि ने अपने-अपने पुरातत्व अनुसंधानओं से सभ्यता की प्रमाणिकता को सिद्ध किया | पुरातत्विक अभियानों
की ही खूबी थी, की मिट्टी में इंच-दर-इंच खुदाई कर इस शहर की, गलियां और घरों को ढूंढा है | इसे केवल
धारणा कहना इस सभ्यता के साथ अन्याय होगा इसलिए सिंधु घाटी सभ्यता केवल धारणा के ना होकर
एक प्रमाणिक सभ्यता है |

प्रश्न 8 - अतीत में दबे पांव पाठ के आधार पर बताइए कि पर्यटक मोहनजोदड़ो में कौन-कौन से
तीन महत्वपूर्ण स्थल देख सकते हैं?
उत्तर -
पर्यटक मोहनजोदाड़ो मैं मौलिक तीन महत्वपूर्ण स्थल देख सकते हैं -
बौद्ध स्तूप - यह सबसे ऊँचे चबूतरे पर निर्मित बड़ा बौद्ध स्तूप है | 1922 में  रखाल दास बनर्जी इसी
बौद्ध स्तूप की खुदाई करते हुए सिंधु सभ्यता के बारे में पहली बार जाना था | बौद्ध स्तूप वाले चबूतरे को
विद्वान गढ़ कहते हैं लेखक वहां की धूप की विशेषता भी बताता है | 
विशाल स्नानागार और कुंड - यहां सामूहिक स्नानागार का स्थान महा कुंड नाम से जाना जाता है | एक
पंक्ति में 8 स्नानघर हैं, जिनमें से किसी के द्वार एक दूसरे के सामने नहीं खुलते | कुंड के तल में और दीवारों
पर ईटों के बीच  चूना और चिराड़ी के गारे का प्रयोग हुआ है | जिससे कुंड का पानी रिसना ना सके और
बाहर का अशुद्ध पानी कुंड में ना आ पाए |
अजायबघर - अजायबघर में काला पड़ गया गेहूं ,बर्तन, मुहरे,चौपड़ की गोटियां, दीपक, तांबे का
आईना आदि दिखाई देते हैं | अजायबघर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहां औजार तो है, पर
हथियार नहीं है |

शुभकामनाओं सहित !

नीलम
35-मॉडल, चंडीगढ़ |

Thursday, July 16, 2020

Vitan Chapter 1 Literature वितान अध्याय 1 गद्य भाग

विद्यार्थियों


आज हम वितान पुस्तिका का अध्याय 1 - सिल्वर वेडिंग (लेखक - मनोहर श्याम जोशी) करेंगे |

सार
सिल्वर वेडिंग कहानी के लेखक प्रसिद्ध पत्रकार और कथाकार मनोहर श्याम जोशी हैं | इस कहानी
में कथाकार ने 2 पीढ़ियों के अंतराल का मार्मिक अंकन किया है | पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के
प्रभाव से आधुनिकता की ओर बढ़ता हमारा समाज एक और कई नई उपलब्धियां प्राप्त करता है |
तो दूसरी ओर भारतीय संस्कृति के मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने वाले मूल्य निरंतर कम होते चले जा
रहे हैं | इसमें दो वाक्य  “जो हुआ  होगा” और “सम हाउ”का प्रयोग हुआ है | जो क्रमश: यथा स्थिति
वाद यानी ज्यों का त्यों स्वीकार लेने का तथा अनिर्णय की स्थिति का परिचायक है |

यशोधर बाबू कहानी के मुख्य पात्र हैं | वे होम मिनिस्ट्री में सेक्शन ऑफिसर के पद पर कार्यरत हैं |
उनके अधीनस्थ कर्मचारी उनके कारण कार्यालय में 5:00 बजे तक बैठे रहते हैं | शाम को चलते
चलते हुए अपने दिन भर के शुष्क व्यवहार को कोई मनोरंजन बात कहकर हल्का करने की कृष्णानंद
पांडे की परंपरा का निर्वाह करते हैं | उनके अधीनस्थों में एक नए लड़के चड्ढा का पहनावा | उन्हें अच्छा
नहीं लगता लेकिन मैं कुछ कह नहीं पाते चड्ढा कुछ मुंहफट भी है | एक बार उसने पंत जी से पूछा बड़े
बाबू आपकी अपनी चूहा दानी का क्या हाल है | क्या सही वक्त देती है पंत जी ने उसकी धृष्टता को
अनदेखा कर दिया तो पंत जी की कलाई थाम ली और घड़ी की और देखऔर बोला बाबा आदम के
जमाने की हैबड़े भाई यह तो अब तो डिजिटल ले लो | एक जापानी सस्ती मिल जाती है | यशोधर
बाबू नहले पर दहला मारते हुए कहते हैं कि यह घड़ी मुझे शादी इसमें मिली थी | हम पुरानी चाल के
हमारी घड़ी पुरानी चाल की अरे बहुत-बहुत है कि अब तक राइट टाइम चल रही है | क्यों कैसी रही ?
किशन दा यशोधर बाबू के आदर्श थे | क्योंकि उन्होंने ही यशोधर को अपने दफ्तर में नौकरी दिलवाई
दफ्तरी जीवन में मार्गदर्शन किया |  किशन दा ने यद्यपि विवाह नहीं किया था | लेकिन उन्होंने पहाड़
से आए कितने ही लड़कों को नौकरी लगाने का आश्रय  दिया था |

 चड्डा ने उनसे पूछा कि आपकी शादी कब हुई थी | यशोधर बाबू ने बताया कि उनका विवाह 6 फरवरी
1947 को हुआ मैंने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि आज तो आपका सिल्वर वेडिंग है चटाने चपरासी को
बुलाया | और उनसे सिल्वर गाड़ी की पार्टी के नाम पर जैसे तैसे ₹30 निकलवा लिए | बाबू परंपरागत
मूल्यों को बनाए रखने के पक्षधर थे | उन्होंने सिल्वर वेडिंग को गोरे लोगों का जो चला  बताया | लेकिन
फिर भी उन्होंने चड्ढा के जिद पर ₹30 दे दिए 1 दिन में लगभग 10 सिगरेट पी जाते हैं, जो कि काम करने
की शैली को प्रभावित नहीं कर पाती | वे सभी से मृदु व्यवहार बनाए रखते हैं | फिजूलखर्ची में विश्वास
नहीं रखते थे पहले गोल मार्केट से एक्टिवेट तक साइकिल पर आते जाते थे | उनके बच्चे युवा हो चुके थे |
उन्हें पिता का साइकिल सवार होना अच्छा नहीं लगता था | बच्चे चाहते थे कि पिताजी स्कूटर ले ले |
परंतु उन्हें समहाऊ बेहूदा सवारी मालूम होती है | अतः वह पैदल ही दफ्तर आते जाते हैं |

बाबू के 3 पुत्र और एक पुत्री है | बड़ा पुत्र भूषण एक विज्ञापन कंपनी में नौकरी करता है | उसे असाधारण
वेतन मिलता है | उसका दूसरा बेटा आईएएस की तैयारी कर रहा है | दूसरी बार परीक्षा में बैठ रहा है |
क्योंकि पिछले साल एलाइड सर्विस की सूची में उसका नंबर काफी नीचे था | उसने ज्वाइन नहीं किया |
तीसरा बेटा स्कॉलरशिप लेकर अमेरिका चला गया था | उनकी एकमात्र पुत्री का कोई वर् पसंद नहीं
आता |  तमाम प्रस्तावित वर को अस्वीकार करती चली आ रही है | उनकी बेटी भी डॉक्टर की उच्चतम
शिक्षा के लिए अमेरिका चले जाने की धमकी देती है | यशोधर बाबू बच्चों  की इस तरक्की से  प्रसन्न
है | वहां सम हाउ  यह भी अनुभव करते हैं कि वे खुशहाली भी कैसी जो अपनों से प्परायापन पैदा करें |
अपने बच्चों द्वारा गरीब रिश्तेदारों की अपेक्षा उन्हें नहीं जचती | परंतु वे जनरेशन के गैप  की बात कहकर
स्वयं को दिलासा देते हैं |


 यशोधर बाबू की पत्नी अपने मूल संस्कारों से किसी भी तरह आधुनिक नहीं लगती | किंतु बच्चों की
तरफदारी करने की मात्री सुलभ मजबूरी ने उन्हें भी मॉडर्न बनने पर विवश कर दिया | जब विष्णु देव
बाबू का विवाह हुआ तब उनका संयुक्त परिवार था |  यशोधर  बाबू परिवार में छोटे थे  | शिव परिवार
में बहू के बीच बढ़े तनाव थे |  उनकी पत्नी को हमेशा यही शिकायत थी कि इस दौर में पति ने कभी
उनका पक्ष नहीं लिया | जेठानी यों की चलने दी | उनकी हर बात को अनसुना कर दिया उसे आचार
व्यवहार ऐसे बंधनों में जकड़ कर रखा गया | मानो वह जवान औरत नहीं बुढ़िया थी | अब उनका पत्नी
के साथ मतभेद होने लगे | उनकी पत्नी ने साफ कह दिया अगर बाबा आदम के जमाने की बातें बच्चे
नहीं मानते तो इसमें उनका कोई कसूर नहीं | वह भी इन बातों को उचित हद तक मानेगी| जिस हद
तक निभाना होगा | किशनदा जिन्होंने यशोधर बाबू की जीवन पर्यंत सहायता की | अपने जमाने के
रंगीन मिजाज और बेफिक्र इंसान थे | क्योंकि वह अविवाहित है | रिटायरमेंट के पश्चात उनकी जो
हुआ होगा से मौत हो जाती है | जिधर बाबू को लगता है कि बच्चों का होना भी जरूरी है | उनके
बच्चे मनमानी कर ऐसा संकेत करते हैं | मान ने बुढ़ापे में उनसे कोई सुख प्राप्त नहीं होगा यशोधर
बाबू सोचते हैं कि जब जिम्मेदारी सिर पर पड़ेगी तब सब ठीक हो जाएगा |

यशोधर बाबू अपने परिवार से वैचारिक आधार पर कभी नहीं जुड़ सके आधुनिकता और प्राचीनता
परंपरागत मूल्यों और पाश्चात्य चकाचौंध की खाई उनके संबंधों को नहीं भर सकती | यशोधर बाबू
की पत्नी समय के अनुसार बदल लेती है | अपने आपको लेकिन पंत जी ऐसा कभी नहीं कर सके |
वह मन मन ही मन स्वीकार करते की दुनियादारी में बीवी बच्चे उनसे इतने अधिक सुलझे हो सकते हैं |
उन्हें बच्चों की गैर जिम्मेदार होना कुल मिलाकर अच्छा नहीं लगता | यशोधर बाबू ने कि चंदा की उक्ति
मूर्ख लोग मकान बनाते हैं | और सिया ने उन में रहते हैं | का अनुसरण करते हुए कभी मकान बनाने की
नहीं सोची सदा सरकारी क्वार्टर में रहे उनका सोचना था | कि जब तक सरकारी नौकरी है तब तक
सरकारी क्वार्टर में रहेंगे रिटायरमेंट होने पर गांव का पुश्तैनी मकान तो है |  वे सोचते थे उनका कौन
कोई सा बेटा उनके रिटायरमेंट होने से पहले सरकारी नौकरी में आ जाएगा | तो क्वार्टर फिर से उनके
पास बना रह जाएगा बाबू चाहते थे | कि उनका आदर करें प्रत्येक बात में सलाह लिया करें साथ ही
नहीं चाहते थे | कि उनके कहे को पत्थर की लकीर समझे | लेकिन बच्चों का कहना है कि पापा आप
तो हद करते हैं | जो बात आप जानते ही नहीं आप क्यों पूछे बच्चे चाहते हैं | कि पंत जी बाजार से
सामान लेने का सारा काम छोड़ दें | उनके लिए घर में नौकर रख लिया जाएगा | उनका कमाऊ बेटा
कहता कि उनकी तनख्वाह दे देगा |  यशोधर बाबू घर में नौकर रखने के पक्ष में नहीं है | क्योंकि उनका
मानना कि नौकरों को सौपा हुआ कारोबार चौपट हो जाता है | काम सब अपने हाथों से ही ठीक होते हैं |

यशोधर बाबू के बच्चे उनकी 25 में विवाह की सालगिरह को बड़ी धूम-धाम से मनाते हैं | एक बड़ी पार्टी
का आयोजन करते हैं | इस बात का पता यशोधर बाबू को घर पहुंचने पर ही चलता है | घर पहुंच कर
वहां के माहौल को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं | उन्हें अपनी पत्नी होठों पर लाली और बालों 
पर खीजाब  यानी कलर  लगाए दिखाई देती है | जब कार वाले मेहमान चले जाते हैं | तो यशोधर बाबू
घर में प्रवेश करते हैं | घर में अभी पार्टी चल रही है | उनके पुत्र पुत्रियों के कई मित्र और उनके रिश्तेदार
अभी भी जमे हुए हैं | इधर बाबू को अपने बेटों से अनेक तरह की शिकायत है | लेकिन कुल मिलाकर
उन्हें अच्छा लगता है कि लोग- बाग उन्हें ईर्ष्या का पात्र समझते हैं | यशोधर  बाबू ने चाहते हुए भी पार्टी
में केक काटते हैं | वह अपनी पत्नी को केक खिलाते हैं | लेकिन वे केक खाने से इंकार कर देते हैं | वह
लड्डू भी नहीं खाते क्योंकि उन्होंने अभी तक संध्या पूजा नहीं की | यह कहकर वे संध्या पूजा करने कमरे
के अंदर चले जाते हैं | उस दिन में पूजा में कुछ ज्यादा ही समय लगा देते | सारे मेहमान धीरे धीरे जाने
लगते हैं | पार्टी वाले दिन उनका बड़ा बेटा भूषण उन्हें ड्रेसिंग गाउन भेंट करता है | ड्रेसिंग गाउन भेंट करते
हुए भूषण कहता कि आप सवेरे यही गाउन पहनकर दूध लेने जाया करें | यह गाउन पर उन्हें ऐसा महसूस
होता है कि उनके अंगों में  किशन दा  उतर आए हैं | जिनकी मौत “जो हुआ होगा” से हुई | 

प्रश्न 1 - यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल सकने में सफल होती है लेकिन यशोधर
बाबू असफल रहते हैं ऐसा क्यों?
उत्तर -
यशोधर बाबू की पत्नी  संयुक्त  परिवार के बंधनों में जकड़ी रही  थी | परिवार में उनकी कभी नहीं
चली | अब वह स्वतंत्रता के अवसर को खोना नहीं चाहती | वे समय  को भली भांति पहचानती है |
वह जानती है कि बच्चों की सहानुभूति तभी प्राप्त की जा सकती है, जब उनके अनुसार चला जाए | 
वह धर्म- कर्म, कुल- परंपरा सबको ढोंग ढकोसला कहती हुई  समय के साथ ढलने में सफल होती है |
किंतु यशोधर बाबू समय के अनुसार ढलने में असफल रहते हैं | क्योंकि वह हमेशा अनिर्णय की स्थिति
में रहते हैं | उनके भीतर आधुनिक-प्राचीन मूल्यों और परंपराओं के बीच द्वंद है | वह परंपरावादी होने के
कारण परिवार के आधुनिक सदस्यों से तालमेल नहीं बिठा पाते | उनमें और परिवार के अन्य सदस्यों
के मध्य वैचारिक अंतर है |

प्रश्न 2 - पाठ में “जो हुआ होगा” वाक्य कि आप कितनी अर्थ छवियां खोज सकते हैं ?
उत्तर -
जो हुआ होगा वाक्य पाठ में पहली बार तब आता है | जब यशोधर कि चंदा के किसी जाति भाई से
उनकी मृत्यु का कारण पूछते हैं | उत्तर में जाति भाई ने कहा “जो हुआ होगा” यानी पता नहीं, क्या हुआ ?
आशय यह है कि बिना बाल बच्चे वाले की चंदा के संबंध में उनके जाती भाई इतने उदासीन थे कि उनकी
मृत्यु किस कारण से हुई उन्होंने यह जानने की जरूरत भी नहीं समझी | किशनदा  की मौत में इस वाक्य
की आधार पर यह निकलाता है कि विवाह एक आवश्यक संस्कार है | बाल बच्चों में भविष्य की अर्थात
वृद्धावस्था की सुरक्षा का बोध बना रहता है | यदि किशोर दा के बाल बच्चे होते तो जाती भाई उनके प्रति
इतनी उदासीन नहीं हो सकते थे | वह बच्चों का होना जरूरी है | 

यह वाक्य  किशन दा भी उपयोग करते हैं | वह इसका प्रयोग अपनों से मिली उपेक्षा के लिए करते हैं |
देखिए - किशन दा कह रहे थे कि भाव सभी जन इसी “जो हुआ होगा” से मरते हैं, ग्गृहस्थ हो, ब्रह्मचारी
हो, अमीर हो, गरीब हो  मरते  “जो हुआ होगा”  से ही है | हां-हां शुरू में और आखिर में सब अकेले ही होते
हैं | अपना कोई नहीं ठहरा दुनिया में बस अपना नियम अपना हुआ | पाठ के अंत में यशोधर बाबू को बच्चों
से मिली | ऐसी  ही व्यंग्य उक्ति के कारण लगा कि सचमुच कि  किशनदा की मौत “जो हुआ होगा” से हुई
होगी | जब बच्चे अपने बुजुर्गों की जीते जी उपेक्षा करने लगते हैं ,तो उनके प्राण सूख जाते हैं |

प्रश्न 3 - “समहाउ इमप्रॉपर” वाक्यांश का प्रयोग यशोधर बाबू लगभग हर वाक्य के प्रारंभ में
तकिया कलाम की तरह करते थे इस वाक्यांश का उनके व्यक्तित्व और कहानी के कथ्य से
क्या संबंध बनता है ?
उत्तर -
“समहाउ इमप्रॉपर” का अर्थ है- कुछ ना कुछ अनुचित अवश्य है | यशोधर बाबू इस वाक्य का प्रयोग
एक तकिया कलाम के रूप में करते हैं | यह वाक्य उनके व्यक्तित्व की यथास्थिति का द्योतक है समाज
में, देश में अथवा उनके परिवार में आधुनिकता के नाम पर जिस पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण किया
जाता है | वह यशोधर बाबू को कुछ अनुचित लगता है | वह निर्णय नहीं कर पाते कि यह उचित है या
अनुचित, इसलिए इस वाक्य का प्रयोग करते हैं | यशोधर बाबू अपने बच्चों की तरक्की से एक और
खुश है | लेकिन वह यह भी अनुभव करते हैं कि ऐसी खुशहाली किस काम की जो अपनों से परायापन 
उत्पन्न करती है | यह वाक्य कहानी का मूल आधार है | यह मूल वाक्य यशोधर बाबू के व्यक्तित्व के
द्वंद को भी व्यक्त करता है |

प्रश्न 4 - यशोधर बाबू की कहानी को दिशा देने में किशन दा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है आपके
जीवन को दिशा देने में किस का महत्वपूर्ण योगदान रहा और कैसे ?
उत्तर -
यशोधर बाबू का जीवन पूरी तरह किशनदा से प्रभावित है | उनका अधीनस्थ  के प्रति व्यवहार, भारतीय
मूल्यों में विश्वास, साधारण रहन-सहन, धन दौलत के प्रति अनासक्ति आदि सभी किशनदास से प्रभावित
होने के कारण है| प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कोई ना कोई आदर्श या प्रेरक होता है | मेरे जीवन को
दिशा देने का कार्य मेरे बड़े भाई साहब का है | वे आज एक प्रसिद्ध शिक्षाविद है | उन्होंने अपनी सभी
परीक्षाएं उच्च प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी | वह बहू पठित है | उन्हें विविध विषयों का गंभीर ज्ञान है |
उनका हमारे पिताजी प्रशासनिक सेवाओं मैं भेजना चाहते थे | किंतु उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि मैं
विश्वविद्यालय परिसर में अध्यापक बनना चाहता हूं | आज उनका पद प्रोफेसर का है | 

उनकी बातें सुनकर उनको मिले पुरस्कार को देखकर मैंने भी यही निर्णय लिया है, कि मुझे उन जैसा बनना
है | इसलिए मैंने प्रारंभिक कक्षाओं से ही अच्छा परीक्षा परिणाम पाना आरंभ कर दिया | अपने विद्यालय 
की सांस्कृतिक गतिविधियों में मेरी सक्रियता से मेरे गुरु जन अत्यंत प्रसन्न है | मैं कॉलेज की हॉकी टीम
का कैप्टन हूं और एक टीवी चैनल के क्विज में भी मेरा प्रथम स्थान आया है | मैं भाई साहब को सादगी
सरलता में भारतीय मूल्यों के प्रति आस्था से बहुत प्रभावित हूं |

प्रश्न 5 - सिल्वर वेडिंग कहानी में एक और स्थिति को ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लेने का भाग है, तो
दूसरी ओर अनिर्णय की स्थिति भी कहानी के इस द्वंद को स्पष्ट कीजिए?
उत्तर -
मनोहर लाल जोशी द्वारा रचित सिल्वर वेडिंग कहानी में स्थिति को ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लेने का
भाग है, तो दूसरी ओर अनिर्णय की स्थिति का द्वंद प्रारंभ से अंत तक बना रहता है | कहानी के मुख्य
पात्र यशोधर बाबू एक साधारण व्यक्ति हैं | वह संयुक्त परिवार को ही अच्छा मानते थे | तथा अपने
संबंधियों की सहायता करना अपना फर्ज समझते थे | उनके बच्चे पढ़ लिखकर अच्छा वेतन प्राप्त
कर रहे हैं | लेकिन यशोधर बाबू उनके कहने पर भी अपनी सादगी को नहीं छोड़ना चाहते थे | बच्चों
के कहने पर यशोधर बाबू की पत्नी ने शादी की 25वीं वर्षगांठ पर पार्टी करने के प्रस्ताव को स्वीकार
कर लिया | लेकिन ऑफिस में यशोधर बाबू से सहकर्मियों द्वारा दावत मांगे जाने पर वे केवल मिठाई
खाने के लिए कुछ रुपए ही देते हैं | घर पर आयोजित पार्टी में वे अनमने ढंग से शामिल तो हो जाते हैं,
लेकिन खाना नहीं खाते इस प्रकार अनेक ऐसी स्थितियां आती हैं | जब  यशोधर बाबू को ना चाहते
हुए भी ढलना पड़ता है | वस्तुतः वे अनिर्णय  की स्थिति से बाहर नहीं आ पाते इस प्रकार संपूर्ण कहानी
परंपरागत जीवन -शैली और आधुनिक विचारधारा से प्रेरित जीवन- शैली से उत्पन्न द्वंद के बीच
रची-बसी है |

प्रश्न 6 - सिल्वर वेडिंग कहानी का प्रमुख पात्र वर्तमान में रहता है, कि अतीत को आदर्श मानता है |
इससे उसके व्यवहार में क्या-क्या विरोधाभास दिखाई पड़ते हैं ? स्पष्ट कीजिए |
उत्तर -
बचपन से ही यशोधर पंत जी पुराने आदर्शों को ही मानते आए थे | इसलिए उन्हें अपने सिद्धांतों पर
चलना अब सही लगने लगा था | किशनदा, जिन्होंने जीवन के हर मोड़ पर उनकी सहायता की, उनके
सिद्धांतों को ही यशोधर बाबू ने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था | यशोधर बाबू नई पीढ़ी के विचारों
से बिल्कुल भी सहमत नहीं थे | इसका  प्रभाव उनके जीवन में इस प्रकार पड़ा कि वे अपने ही परिवार से
दूर हो गए | परिवार के लोगों ने नए ढंग से चलने के लिए कहने लगे | पत्नी भी कह  देती थी, कि आप
भी इतने पूजा पाठ में लगे रहते हैं जैसे कि बूढ़े हो गए  हो  बेटा भी उनके साईकिल चलाने के विरोध में
था | और उनकी बेटी भी अमेरिका जाने की धमकियां देती थी | भूषण अपनी कमाई का रोब प्रत्येक
कार्य में दिखा देता था | यशोधर पंथ अपने सिद्धांतों के प्रति निष्ठा वान थे | लेकिन उनकी पत्नी और
बच्चे आधुनिक नियमों को मानने के कारण  यशोधर बाबू के विपरीत ही सोचते थे |  इन विपरीत
परिस्थितियों के कारण ही पंत जी के जीवन में अनेक विरोधाभास दिखाई पड़ते हैं |

प्रश्न 7- यशोधर बाबू द्वारा घर में पार्टी के दिन पूजा का समय बढ़ाना | उनके मानसिक द्वंद्व को प्रकट
करता है | पाठ सिल्वर वेडिंग के आधार पर स्पष्ट कीजिए?
उत्तर -
यशोधर बाबू अपनी शाम की पूजा का समय 15:00 मिनट से बढ़ाकर 25 मिनट तक ले जाते हैं | क्योंकि
वे चाहते हैं कि उनकी पूजा के दौरान ही पार्टी में आए लोग खा पी कर चले जाएं | यशोधर बाबू आधुनिकता
के मानदंडों को स्वीकार नहीं कर पाते | उन्हें आज की जीवनशैली में जीना समहाउ इम्प्रॉपर लगता है - बेटे 
द्वारा गैस के चूल्हे का प्रबंध करना, फ्रिज का घर में आना, सोफा, डबल बेड तथा श्रृंगार मेज आदि सभी
दिखावा करने के प्रतीक लगते हैं | अपनी शादी की 25वीं वर्षगांठ मनाना भी उन्हें गलत ही लगता है |
पश्चिमी सभ्यता के अनुसार केक- काटना मेहमानों से औपचारिकता निभा ना, यशोधर बाबू को उनके
सिद्धांतों के विरुद्ध लगता है | अपने इन्हीं दृष्टिकोण के फल स्वरुप में नए व पुराने जैसे सिद्धांतों के द्वंद
में फंसे हुए हैं | वे अपने मन में बसी हुई  किशनदा  वाली छवि से बाहर ही नहीं निकल पाते | यह अपेक्षा
रखते हैं कि उनके सिद्धांत आज भी उनका मार्गदर्शन कर सकेंगे और यह बता सकेंगे कि उनके बीवी-बच्चे
जो कुछ भी कर रहे हैं, उसके विषय में क्या व्यवहार अपनाना चाहिए, परंतु उन्हें इसका कोई संतोषजनक
उत्तर नहीं मिलता | उन्हें पार्टी अपने सिद्धांतों के विपरीत लगती हैं इसलिए यशोधर बाबू अपनी पूजा का
समय बढ़ा देते हैं |

प्रश्न 8 - सिल्वर वेडिंग आधुनिक पारिवारिक मूल्यों के विघटन का यथार्थ चित्रण है - इस कथन
की विवेचना कीजिए |
                                                  अथवा
आज का जीवन धन पर आधारित है सिल्वर वेडिंग कहानी के आधार पर स्पष्ट करें |
उत्तर -
यशोधर बाबू पाश्चात्य सभ्यता से विरक्त रहते हैं | उनका व्यवहार अपनी पत्नी और बच्चों के प्रति
विरोध की भावना दर्शाता है | क्योंकि भी प्राचीन विचारों का समर्थन करते हैं, जबकि उनका परिवार
आधुनिक विचारों के पक्ष में रहता है | वर्तमान समय वस्तुतः अर्थ पर आधारित हो गया है वर्तमान
समय में यदि परिवार में धन की अधिकता है, तभी परिवारिक संबंध निभ एवं टिक पाते हैं | अन्यथा
परिवार को बिखरते देर नहीं लगती यशोधर बाबू को धन से विशेष लगाव नहीं है इसलिए मैं अधिक
धन कमाने पर ध्यान नहीं देते | उनका बड़ा भूषण विज्ञान कंपनी में 1500  रुपए प्रतिमाह पर काम
करता है और उन दोनों के बीच वैचारिक अंतर बहुत गहरा है | पैसे के कारण उनके घर में तनाव बना
रहता था | इसलिए कहा जाता है कि आज का जीवन धन पर आधारित है | आज संबंधों का टिकना
आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है | अर्थात जब तक आर्थिक स्थिति बेहतर रहती है | तब तक सब
ठीक रहता है |यदि धन का अभाव होने लगता है | तो संबंधों में धीरे-धीरे खटास और दूरियां बढ़
जाती है | अतः इसलिए कहा जाता है कि सिल्वर वेडिंग आधुनिक परिवारिक मूल्यों के विघटन का
यथार्थ चित्रण है |

प्रश्न 9 - यशोधर बाबू के मिलनसार व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए ?
उत्तर -
यशोधर बाबू का स्वभाव एक मिलनसार व्यक्ति का है | अपने इसी स्वभाव के कारण वे दिन भर
काम में लगे रहने के उपरांत भी शाम को जाते समय हंसी मजाक किया करते थे | कब से अकेले
दिल्ली आने के पश्चात किशनदा  के घर पर कई लोगों के साथ मिलकर रहने का गुण भी | उनकी
इसी विशेषता  को रेखांकित करता है | अपने मिलनसार व्यक्तित्व के कारण ही वे खुशी या गम
हर अवसर पर रिश्तेदारों के यहां जाना आवश्यक समझते हैं | चाहते कि बच्चे भी परिवार की
महत्ता को समझे और इस परंपरा को बनाए रखें | वह अपनी बुआ को भी कुछ पैसे आर्थिक सहायता
के लिए भेजते रहें | इसके साथ ही, वे  कई सामाजिक आयोजनों में भी रुचि लेते हैं | जैसे घर में
होली मनाना, सब कुमाऊनी यों को जनेऊ बदलने के लिए अपने घर आमंत्रित करना, राम लीला
की तैयारी के लिए क्वार्टर का एक कमरा दे देना, आदि इन सब बातों से यह पता चलता है, कि
ईश्वर बाबू ने केवल पारिवारिक मूल्यों में विश्वास रखते हैं बल्कि सामाजिक स्तर पर भी वे
अत्यधिक मिलनसार व्यक्ति थे |

प्रश्न 10 - किशनदा ने यशोधर बाबू की बहुत सहायता की थी | इस कथन को सिल्वर वेडिंग
कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए |
उत्तर -
यशोधर बाबू जब दिल्ली में आए तब उनकी आयु सरकारी नौकरी के अनुरूप नहीं थी | इस कठिन
परिस्थितियों में उनके पास यहां रहने का कोई स्थान भी नहीं था, तब किशनदा ने यशोधर बाबू को
अपने घर रहने के लिए स्थान दिया और गांव से उनके घर  पर ठहरने वाले लड़कों के लिए खाना
बनाने के लिए रसोईया के रूप में रख लिया | यशोधर को मैस का रसोईया बना दिया | उन्होंने
यशोधर बाबू को ₹50 भी दिए | जिससे मैं नए कपड़े सिलवा सके और कुछ  पैसे गांव भी भेज सके | 
यशोधर बाबू जब गांव से आए थे तब उनकी देरी से उठने की आदत थी | किशनदा ने उनकी आदत
को सुधारते हुए जीवन में जल्दी उठने का महत्व बताया | इसके पश्चात उनकी यह आदत जीवन पर्यंत
बनी रही | किशनदा ने उनकी शिक्षा में भी सहायता की और नौकरी भी उन्होंने ही दिलवाई | किशनदा
ने जीवन के हर सुख-दुख में मार्गदर्शन की वह यशोधर बाबू को भाऊ यानी बच्चा कहते थे | शादी के
बाद भी किशनदा यशोधर बाबू का बहुत ध्यान रखते थे | इस प्रकार की किशनदा यशोधर पंत जी
की बहुत सहायता थी |

शुभकामनाओं सहित !
नीलम
35-मॉडल, चंडीगढ़ |