Sunday, July 19, 2020

Vitan Chapter 3 Literature वितान अध्याय 3 गद्य भाग

विद्यार्थियों


आज हम वितान पुस्तिका का अध्याय 3 - अतीत में दबे पाव (लेखक - ओम थानवी) करेंगे |

सार
अखंड भारत में बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में प्राचीन सभ्यता की खोज में दो स्थानों पर खुदाई
का कार्य किया गया था | वर्तमान समय में यह दोनों स्थान पाकिस्तान के अंतर्गत हैं | पाकिस्तान के
सिंध प्रांत में मोहनजोदाड़ो और पंजाब प्रांत में हड़प्पा नाम के दो नगरों का पुरातत्विक क्षेत्र के विद्वानों
ने खुदाई के बाद सिंधु घाटी की सभ्यता का पता लगाया | 

मोहनजोदाड़ो का परिचय - मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा संसार की प्राचीनतम नियोजित शहर में माने
जाते हैं | मोहनजोदाड़ो का अर्थ मुर्दों का टीला है | यह नगर मानव- निर्मित, छोटे-मोटे टीलो पर आबाद
था | इस नगर की सभ्यता के नष्ट होने के बाद उसे यह नाम मिला | सिंधु घाटी सभ्यता के परिपक्व
दौर का सबसे उत्कृष्ट नगर है | खुदाई के बाद इस नगर में बड़ी तादाद में इमारतें, सड़कें, धातु-पत्थर
की मूर्तियां, चौक पर बने चित्रित भांडे, मोहरे, साजो समान और खिलौने आदि मिले हैं | मोहनजोदाड़ो
अपने दौर में सभ्यता का केंद्र था | संभवत यह इस क्षेत्र की राजधानी था | यह शहर 200 हेक्टेयर में
फैला था | 5000 वर्ष पूर्व यह एक महानगर था | इस नगर से सैकड़ों मील दूर हड़प्पा नामक नगर था,
जिसके साक्ष्य रेल लाइन बिछाने के समय नष्ट हो गए थे |

नगर- रचना - यह नगर मैदान में नहीं है अपितु एक टीले पर बसा था यह पीले प्राकृतिक नहीं, अब 
मानव-निर्मित है | इन भी कच्ची- पक्की ईटो से धरती की सतह को ऊंचा उठाया गया है | यह कार्य
सिंधु के पानी से बचाव के लिए किया गया था | यह नगर भले ही आज खंडवा में बदल गया है, किंतु
इसके स्वरूप का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है | यह नगर भले ही आज खंडहरों में बदल
गया, किंतु इसके स्वरूप का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है, कि इस की गलियाँ, सड़कें,
कमरे, रसोई, खिड़की, चबूतरे, आंगन, सीढ़ियां आदि इस नगर के सुंदर नियोजन की कहानी स्वतः ही
कह देते हैं | यहां की सभी सड़कें सीधी या ऑडी हैं | आज के वस्तु कार से ग्रिड प्लान कहते हैं | पर
बने बौद्ध स्तूप के पीछे गढ़ और ठीक सामने वर्ग की बस्ती है | उसके पीछे 5 किलोमीटर सिंधु नदी
बहती है | दक्षिण में कामगारों की बस्ती है | नगर में 40 फुट लंबा और 25 फुट चौड़ा एक तालाब है,
जिसे महा कुंड नाम दिया है | महा कुंड की गहराई 7 फुट कुंड में उत्तर और दक्षिण में सीढ़ियां उतरते हैं | 
उत्तर दिशा में आठ स्नानघर है, जिनमें किसी का भी द्वार एक दूसरे के सामने नहीं खुलता | तीन और
साधुओं के कक्ष उस काल की सिद्ध वास्तुकला का यह भी एक नमूना है | कुंड का तेल और दीवारें चुने
और पक्की ईंटों से बनाए गए हैं | कुंड में बाहर के अशुद्ध पानी को ना आने देने का ध्यान रखा गया है |
कुंड में पानी की व्यवस्था के लिए एक तरफ कुआं है और कुआं भी दोहरे घेरे वाला है | कुंड के पानी का
बाहर निकलने के लिए नालियां है और नालियां पक्की बनाई गई हैं और उनको ढका भी हुआ है | निकासी
की ऐसी सुव्यवस्थित व्यवस्था इससे पहले की  इतिहास में नहीं मिलती | 

बौद्ध स्तूप - मोहनजोदड़ो सभ्यता के बिखरने के बाद एक जीर्ण शीर्ण किले के सबसे ऊंचे चबूतरे पर
एक बड़ा सा बौद्ध स्तूप है | यह तू 25-फुट ऊंचे चबूतरे पर है और इसका निर्माण का लगभग 26 वर्ष
पूर्व का है | चबूतरे पर भिक्षुओं  के कमरे भी हैं | इस खुदाई के बाद ही भारत की सभ्यता की गणना मिस्र
और इराक (मेसोपोटामिया) की प्राचीन सभ्यता के साथ होने लगी है | यह बौद्ध स्तूप भारत का सबसे
पुराना लैंडस्केप है | इसको देखकर दर्शक रोमांचित हो उठता है | इतना प्राचीन स्तूप ना जाने कितनी
सभ्यताओं का साक्षी है | यह स्तूप वाला हिस्सा मोहनजोदाड़ो के सबसे खास हिस्से के एक सिरे पर स्थित
है | इस  भाग को पुरातत्व के विद्वान गढ़ कहते हैं | मोहनजोदाड़ो में यह अकेली इमारत है, जो अपने मूल
स्वरूप के बहुत ही नज़दीक बची रही |

सिंधु घाटी की खेती एवं व्यापार - सिंधु घाटी में व्यापार के साथ उन्नत खेती भी थी | यह खेतिहर और
पशु पालक सभ्यता थी | यहां ज्वार बाजरा रागी की उपज होती थी | खजूर, खरबूजे और अंगूर भी होते थे | 
कपास की खेती भी होती थी | मोहनजोदाड़ो में सूट की कटाई- कढ़ाई बुनाई के साथ रंगाई भी होती थी |
रंगाई का एक छोटा सा कारखाना भी खुदाई में मिला है | यह सभ्यता  उन सुमेर में आयात करती थी, और
सूती कपड़ा निर्यात करती थी | इस सभ्यता को तांबे का ज्ञान भी था | सिंधु में पत्थर था राजस्थान में तांबे
की कहानी थी | इनके ही उपकरण खेती-बाड़ी में काम आते थे | वहां रबी की फसल कपास, गेहूं, जौ, सरसों 
और चने की उपज के  तो पुख्ता प्रमाण मिले हैं | 

महा कुंड के आसपास के भवन - महा कुंड के उत्तर पूर्व में एक बहुत लंबी सी इमारत के अवशेष हैं | जिसमें
दलान बरामदे छोटे छोटे कमरे बने हुए दक्षिण में भी भगन इमारत है | जिसमें 20 खंबों वाला एक बड़ा हाल है |
यह संभवत राज्य सचिवालय, सभा भवन या कोई सामुदायिक केंद्र रहा होगा | मोहनजोदाड़ो की खुदाई करने
वाले पुरातत्व विभाग के  नाम से संक्षिप्त मोहल्ले बन गए-जैसे डीके हल्का, और डीके जी  हल्का | 

डीके हल्का - डीके के नाम पर दो हल्के हैं | डीके हल्का सबसे महत्वपूर्ण है | शहर की मुख्य सड़क यहीं
पर है | यह बहुत लंबी सड़क है | अब तो आधा मिल ही बची है इसकी चौड़ाई 33 फुट है | इस सड़क के
दोनों ओर घर है | किंतु किसी भी घर का दरवाज़ा सड़क की ओर नहीं है | उनके दरवाज़े अंदर गली में है |
मुख्य सड़क की ओर पीठ है | किसी के घर जाने के लिए पहले मुख्य सड़क से सेक्टर की गली में जाना
पड़ता है | सड़क के दोनों तरफ समांतर ढकी हुई गलियाँ है | हर घर में स्नान घर है खुली नालियां बस्ती में
भी नहीं है | घर का पानी पहले घर की हाउदी में आता है, फिर सड़क की नाली में बस्ती के भीतर 9 से 12
फुट चौड़ी सड़क है | बस्ती में कुएँ भी हैं | पूरे मोहनजोदाड़ो में लगभग 700 कुएँ हैं | सिंधु घाटी की सभ्यता
नदी, कुएँ, कुंड, स्नानागार और बेजोड़ पानी निकासी के कारण जल संस्कृति कही जा सकती है |

डीके जी हल्का - बड़ी बस्ती में पुरातत्व शास्त्री काशीनाथ दीक्षित के नाम पर एक हल्का डीकेजी कहलाता
है | यहां घरों की दीवारें उनकी और मोटी है | शायद यहां दो मंजिले मकान रहे हो | कुछ दीवारों में छेद है |
सभी घर एक अनुपात 2 अनुपात 4 की  भट्टी की  पक्की ईंटों से बने हैं  यहां पत्थर का प्रयोग नगण्य है 
छोटे- बड़े सब घर एक पंक्ति में हैं | अधिकतर 30 x30 फुट के हैं | कुछ इनसे दुगने व तिगने आकार के
भीहैं | लेकिन है, सभी एक जैसे | एक घर मुखिया का घर कहलाता है, इसमें दो आंगन और 20 कमरे हैं |
बड़े घरों में ऊपर की मंजिल के निशान है | बड़े छोटे सभी घरों में कमरों का आकार प्राय छोटा है | जिसे
अनुमान लगाया जाता है कि शहर की आबादी ज्यादा नहीं रही होगी | छोटे कमरों में छोटी संक्री सीढ़ियां
हैं जिनके पायदान  ऊंचे हैं | शायद यह  जमीन कीतंगी के कारण हो | नहर के चिन्ह नहीं मिले हैं लगता है | 

राजस्थान की याद - मोहनजोदड़ो की गलियों में घरों को देखकर लेखक को राजस्थान याद आता है |
ज्वार, बाजरे की खेती व, बेर तो समानता के कारण है | इसके अतिरिक्त जैसलमेर का कुलधरा गांव भी
मोहनजोदड़ो की याद दिलाता है | उस गांव के  निवासी अपने राजा से तकरार के कारण सारा गांव खाली
करके चले गए थे | पीले पत्थरों से बना यह सुंदर गांव अपने बाशिंदों की मानो प्रतीक्षा कर रहा है | राजस्थान
के समान ही गुजरात, पंजाब और हरियाणा में भी कुएं, कुंड  कच्ची- पक्की ईंटों के कई घर आज भी वैसे
मिलते हैं, जैसे हजारों साल पहले हुए हो | 

जॉन मार्शल की पुस्तक - जॉन मार्शल ने मोहनजोदड़ो पर तीन खंडों का एक बहुत बड़ा प्रबंध छुपाया है |
उसमें सिंधु घाटी से 100 वर्ष पहले प्रयोग होने तथा खुदाई में मिली तो पहियों वाली गाड़ी-दोनों के चित्र
है | इन चित्रों के माध्यम से उन्होंने परंपरा को सिद्ध किया है | बैलगाड़ी में अरे वाले पहिए परिवर्तित है |
अब तो  जीप के उतरे हुए पहिए भी काम आने लगे हैं | ऊंट गाड़ी में हवाई जहाज के उतरे  पहिए काम कर
रहे हैं | 

मोहनजोदाड़ो का अजायबघर - साबुत इमारत में अजायबघर हैं या किसी कस्बाई स्कूल की छोटी इमारत 
जैसा है | अजायबघर छोटा है | समान भी ज्यादा नहीं है | अहम चीजें कराची, लाहौर, दिल्ली और लंदन में
है, या अकेले मोहनजोदाड़ो की खुदाई में निकली पंजीकृत चीजों की संख्या 50 हजार से ज्यादा है | मगर
जो मुट्ठी भर चीजें यहां प्रदर्शित हैं | पहुंची हुई सिंधु घाटी सभ्यता की झलक दिखाने को काफी है | काला पड़
गया गेहूं, तांबे और कांसे के बर्तन, मोहरे, वाद्य, चाक पर बने विशाल बर्तन, उन पर काले भूरे चित्र, चौपड़ की
गोटियां, दिए माप तोल पत्थर, तांबे का आईना, मिट्टी की बैलगाड़ी और दूसरे खिलौने, दो पाटों वाली चक्की,
कंगी, मिट्टी के कगन, रंग-बिरंगे पत्रों के मनको वाले हार, पत्थर के औजार आदि कुछ सोने के गहने भी यहां
हुआ करते थे, जो कि चोरी हो गए हैं | 

मोहनजोदाड़ो हड़प्पा सभ्यता - संस्कृति में ना भव्य राज प्रसाद हैं, ना मंदिर और ना राजाओ, महंतों की
समाधिया, मूर्ति शिल्प भी छोटे हैं | नरेश यानी राजा के मुकुट भी छोटे हैं ना में भी छोटी है यह लोग लघुता में
मेहता अनुभव करते थे | मोहन जोदड़ो सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा नगर था साधनों और व्यवस्थाओं के
लिहाज से समृद्ध बीता इसमें भव्य व आडंबर का भाव रहा है | इस सभ्यता की अधिक चर्चा ना होने के कारण
इसकी अभी तक पढ़ी जाने वाली लिपि भी है | सिंधु घाटी की सभ्यता के बारे में लेखक लिखता है - सिंधु
घाटी के लोगों में कला या सुरुचि का महत्व ज्यादा था | वस्तु कलाइयां नगर नियोजन ही नहीं धातु, पत्थर
की मूर्तियां,मृदभांड, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति और पशु पक्षियों की छवियां, निर्मित मोहरे, उन पर
बारीकी से उत्तीर्ण आकृतियां, खिलौने, भूषण और सबसे ऊपर  सुघड़ अक्षरों का लिपि रूप सिंधु घाटी 
को तकनीक-फिर से ज्यादा कला-सिद्ध जाहिर करता है | एक पुरातत्ववेता के मुताबिक सिंधु घाटी की
सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य बोध है, “जो राज पोषित या धर्म पोषित ना होकर समाज पोषित था
शायद इसलिए आकार की भव्यता की जगह उसमें कला की भव्यता दिखाई देती है | 

समापन - सिंधु के पानी के रिसाव के कारण मोहनजोदाड़ो की खुदाई का काम बंद कर दिया गया | पानी
के रिसाव से क्षार और दल दल की समस्या पैदा हो गई | अब तो इन खंडहरों को बचाना भी एक समस्या है |

प्रश्न 1 - सिंधु-सभ्यता साधन- संपन्न पर उसमें भव्यता का  आडंबर नहीं था | कैसे?
उत्तर -

सिंधु घाटी- सभ्यता साधन संपन्न थी, यह बात उस सभ्यता के भव्य खंडहरों से सिद्ध होती है | स्नानागार, 
मृदभंडारों कुओं-तालाबों, गली-सड़क व्यवस्था तथा जल निकासी की  ढकी हुई नालियां | उनके शानदार
रहन सहन और उन्नत जीवन शैली पर प्रकाश डालती हैं और बताते हैं, कि वे लोग साधन संपन्न थे | उनकी
जीवनशैली बड़ी सादगी से भरी थी | उसमें दिखावा आडंबर नहीं था | वे अनुशासित थे, पर ताकत के बल
पर नहीं | उनकी खूबी उनका सौंदर्य बोध था, जो राज-पोषित या धर्म-पोषित ना होकर समाज -पोषित था | 
खुदाई में प्राप्त  वस्तुओं से यह सिद्ध हो जाता है कि सिंधु-सभ्यता उच्च विकसित साधन-संपन्न सभ्यता थी |
उनके घर उनकी जरूरत के अनुसार थे | उनमें कहीं भी अनावश्यक विस्तार और दिखावटी पन नहीं था |

प्रश्न 2 - सिंधु-सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है जो राज पोषित या धर्म पोषित ना होकर
समाज-पोषित था, ऐसा क्यों कहा गया?
उत्तर -
मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा तक समूची सभ्यता में कहीं हथियार नहीं मिले, जो किसी राजतंत्र में होते हैं | 
वह अनुशासन अवश्य था पर ताकत के बल पर नहीं | वहां शायद कोई सेना-संस्था नहीं थी | परंतु कोई
अनुशासन अवश्य या जो नगर योजना, वास्तुशिल्प, मोहरों, पानी या साफ-सफाई जैसी सामाजिक
व्यवस्थाओं में आदि में एकरूपता स्थापित किए हुए था | यही बात इसे दूसरी सभ्यताओं से अलग करती है |
यहां पर राज तंत्र, धर्म तंत्र की शक्ति का प्रदर्शन करने वाले महत्व, उपासना स्थल, मूर्तियां और पिरामिड
आदि नहीं मिलते हैं | ना राजाओ, महंतों की समाधि है | यह सभ्यता ताकत के बल पर ना होकर आपसी
समझ पर आधारित थी | सिंधु घाटी के लोगों में कला या सुरुचि का महत्व अधिक था |

वस्तु कला नगर नियोजन ही नहीं, और पत्थर की मूर्तियां, मृदुभांड, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति और
पशु पक्षियों की छवियां, पत्तियों की छवियां, सु निर्मित मोहरे, उन पर बारीकी से चित्रित आकृतियां, खिलौने, 
केश विन्यास, भूषण और सबसे ऊपर सुपर अक्षरों का लिपि रूप आदि सिंधु सभ्यता को तकनीक सिद्ध से
अधिक कला सिद्ध व्यक्त करता है | इससे सिद्ध होता है कि सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है जो
राज-पोषित या धर्म-पोषित न  होकर समाज पोषित था | संभवत इसलिए आकार की भव्यता के स्थान पर
उसमें कला तथा उपयोगिता की भव्यता दिखाई देती है | सिंधु घाटी का समाज राज-तंत्र अथवा धर्म- तंत्र
की बल्कि उपेक्षा व स्वानुशासित था | समाज में सौंदर्य बोध था | किंतु कोई राजनीतिक या धार्मिक आडंबर
नहीं था | इसलिए यह कहा गया कि सिंधु घाटी की खूबी उसका सौंदर्य बोध है जो राज-पोषित या धर्म-पोषित
ना होकर समाज-पोषित था |

प्रश्न 3 - पुरातत्व के किन चिन्हों के आधार पर आप यह कह सकते हैं, कि -
सिंधु-सभ्यता  ताकत से शासित होने की अपेक्षा समझ से अनुशासित सभ्यता थी|
उत्तर -
मोहनजोदाड़ो के अजायबघर में प्रदर्शित वस्तुओं में कलाकृतियां है | उजार हैं किंतु कोई हथियार नहीं है |
मोहनजोदाड़ो क्या हड़प्पा से लेकर हरियाणा तक समूची सिंधु सभ्यता में हथियार उस तरह कहीं नहीं मिले |
जैसे किसी राज तंत्र में होते हैं | यदि सभ्यता में कोई शक्ति केंद्र होता तो उसके चित्र मिलते | इनके तो नरेश
के सिर पर मुकुट भी बहुत छोटा सा है | राज महल नहीं, मंदिर नहीं, समाधि नहीं | इससे यह अर्थ निकलता
है कि इस सभ्यता में सत्ता का कोई केंद्र नहीं था | अनुशासन स्वयं का था ताकत के बल पर आधारित नहीं था |
इन आधारों पर ही पुरातत्वविद यह मानते हैं कि कोई सैन्य सत्ता शायद यहां न रही हो | इस समाज में एकरूपता
थी | सभी नागरिक अपनी समझ से अनुशासित थे |

प्रश्न 4-  टूटे-फूटे खंडहर, सभ्यता और संस्कृति इतिहास के साथ-साथ धड़कती जिंदगी यों के अनछुए
समयो का भी दस्तावेज़ होते हैं - इस वर्णन कथन का भाव स्पष्ट कीजिए? 
उत्तर - 
मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा जैसे नगरों के खंडहर तत्कालीन सभ्यता और संस्कृति तथा इतिहास के प्रभाव के
रूप में देखे जाते हैं | परंतु यह खंडहर केवल इतिहास मात्र नहीं है, अपितु भी हमारा ध्यान उस ओर खींचते हैं |
जब लोग इन घरों में रहते होंगे और उन में जनजीवन गूंजता होगा | इन खंडहरों के आधार पर तत्कालीन जन
जीवन उनके रहन-सहन, अनुभव, सोच विचार आदि के संबंध पर भी प्रकाश पड़ता है | इन  खंडहरों को देखकर
तत्कालीन सामाजिक जीवन की कल्पना भी की जा सकती है | और यह प्राचीन सभ्यता के ठोस प्रमाण है |

प्रश्न 5 - सिंधु घाटी सभ्यता को जल संस्कृति कह सकते हैं ? कारण सहित उत्तर दीजिए | 
उत्तर -
नदी, कुएँ, स्नानागार और बेजोड़ जल निकासी व्यवस्था को देखते हुए सिंधु घाटी सभ्यता को जल संस्कृति
कहा जा सकता है | सिंधु घाटी सभ्यता में सामूहिक स्नान के लिए बने स्नानागार उत्कृष्ट वास्तुकला के उदाहरण
होने के साथ-साथ तत्कालीन जल प्रबंधन की उत्कृष्टता को भी दर्शाते हैं | एक पंक्ति में 8  स्नानघर हैं, जिनमें
से किसी का भी द्वार एक दूसरे के सामने नहीं खुलता है | पानी के जमाव वाले कुंड के तल में तथा दीवारों पर
ईटों के बीच चूने और  चिराड़ी गारे का प्रयोग किया हुआ है | जिससे कुंड का पानी रिस कर बाहर ना आ सके
और बाहर का अशुद्ध पानी कुंड में ना जा सके | सिंधु सभ्यता के नगरों में सड़कों के साथ बनी हुई नालियां
पक्की इंटों की बनी हुई हैं, और ढकी हुई है | पीने के पानी के लिए नगर में लगभग 700 कुए थे | मोहनजोदाड़ो
के निकट ही सिंधु नदी भी बहती थी | मोहनजोदाड़ो में जितने भी घर थे सभी मकानों में अलग-अलग स्नानघर भी थे |

प्रश्न 6 - मोहनजोदाड़ो की नगर योजना आज की सेक्टर, मार्क-कॉलोनियों के नियोजन से किस
प्रकार बेहतर थी पाठ अतीत में दबे पांव के आधार पर स्पष्ट कीजिए |
उत्तर -
मोहनजोदाड़ो की नगर योजना वास्तव में आज की सेक्टर मार्क कॉलोनियों के नियोजन से अधिक बेहतर थी | 
मोहनजोदाड़ो छोटे-मोटे किलो पर आबाद था | यह  टीले प्राकृतिक नहीं थे | कच्ची और पक्की दोनों तरह की
ईटों से धरती की सतह को ऊंचा उठाया गया था | ताकि सिंधु नदी का पानी बाहर फैल जाए, तो उससे बचा
जा सके | मोहनजोदाड़ो की सड़कें चौड़ी थी | यहां की सड़कें सीधी या ऑडी भी थी | मोहनजोदाड़ो की जल
निकासी का प्रबंध इतना उन्नत था, कि आज के वास्तुकार भी उसे देखकर सोच में पड़ जाते हैं | नगर की
योजना अत्यंत सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक रूप से तार्किक थी | घरों की बनावट हो या सार्वजनिक स्थानों की
योजना, सभी में तार्किक सुव्यवस्था थी | इस शहर में उच्च वर्ग की बस्ती, स्नानागार, ढकी नालियां, पानी की
निकासी की व्यवस्था, सभा भवन, घर की बनावट आदि देकर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है, कि यहां की
नगर योजना अतुलनीय थी |

प्रश्न 7 - सिंधु घाटी की सभ्यता केवल अवशेषों के धार पर बनाई गई एक धारणा है अतीत में दबे
पांव पाठ के आधार पर इसके पक्ष या विपक्ष में अपने विचार प्रस्तुत करें |
उत्तर -
पक्ष - सिंधु सभ्यता साधन संपन्न थी | यहां पर साधनों की कमी नहीं थी | सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों
के आधार पर ही इसकी नगर योजना, कृषि, संस्कृति और कला आदि के बारे में बताया जा सकता है |
अवशेषों में कोई लिखित प्रमाण नहीं मिले हैं, और इतनी पुरानी सभ्यताओं के लिखित प्रमाण संभव होते भी
नहीं है जो चित्र लिपि यहां से मिली है | उसका अध्ययन करना भी अत्यंत कठिन है | इस कारण केवल
अवशेषों को ही प्रमाण माना जाता है | यह विशेष मनुष्यों द्वारा बनाए गए हैं ,जो इतने समय के बाद भी
अभी तक उपलब्ध हैं | सिंधु घाटी में  ईटों, मूर्तियों,  भवनों  आदि के अवशेष मिलते हैं | इन प्रमाण  के
कारण संपूर्ण सभ्यता व संस्कृति की सुंदर कल्पना की  गई है | वस्तुत यह एक प्रकार की धारणा ही है |
सिंधु घाटी की सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य बोध है ,जो वस्तु जिस प्रकार सुंदर लग रही थी | उसका
उस प्रकार से उपयोग किया गया था | 

विपक्ष - सिंधु घाटी सभ्यता को अवशेषों के आधार पर निर्मित एक धारना मानना अनुचित  है | वर्ष 1922
में रखाल दास बनर्जी द्वारा मोहनजोदाड़ो में खुदाई करने से प्राप्त अवशेषों से इस सभ्यता के दावे को
वैज्ञानिक आधार प्रदान किया था | इसके पश्चात काशीनाथ दीक्षित, हेराल्ड हरग्रीव्स, शिरौन  रत्नाकर
आदि ने अपने-अपने पुरातत्व अनुसंधानओं से सभ्यता की प्रमाणिकता को सिद्ध किया | पुरातत्विक अभियानों
की ही खूबी थी, की मिट्टी में इंच-दर-इंच खुदाई कर इस शहर की, गलियां और घरों को ढूंढा है | इसे केवल
धारणा कहना इस सभ्यता के साथ अन्याय होगा इसलिए सिंधु घाटी सभ्यता केवल धारणा के ना होकर
एक प्रमाणिक सभ्यता है |

प्रश्न 8 - अतीत में दबे पांव पाठ के आधार पर बताइए कि पर्यटक मोहनजोदड़ो में कौन-कौन से
तीन महत्वपूर्ण स्थल देख सकते हैं?
उत्तर -
पर्यटक मोहनजोदाड़ो मैं मौलिक तीन महत्वपूर्ण स्थल देख सकते हैं -
बौद्ध स्तूप - यह सबसे ऊँचे चबूतरे पर निर्मित बड़ा बौद्ध स्तूप है | 1922 में  रखाल दास बनर्जी इसी
बौद्ध स्तूप की खुदाई करते हुए सिंधु सभ्यता के बारे में पहली बार जाना था | बौद्ध स्तूप वाले चबूतरे को
विद्वान गढ़ कहते हैं लेखक वहां की धूप की विशेषता भी बताता है | 
विशाल स्नानागार और कुंड - यहां सामूहिक स्नानागार का स्थान महा कुंड नाम से जाना जाता है | एक
पंक्ति में 8 स्नानघर हैं, जिनमें से किसी के द्वार एक दूसरे के सामने नहीं खुलते | कुंड के तल में और दीवारों
पर ईटों के बीच  चूना और चिराड़ी के गारे का प्रयोग हुआ है | जिससे कुंड का पानी रिसना ना सके और
बाहर का अशुद्ध पानी कुंड में ना आ पाए |
अजायबघर - अजायबघर में काला पड़ गया गेहूं ,बर्तन, मुहरे,चौपड़ की गोटियां, दीपक, तांबे का
आईना आदि दिखाई देते हैं | अजायबघर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहां औजार तो है, पर
हथियार नहीं है |

शुभकामनाओं सहित !

नीलम
35-मॉडल, चंडीगढ़ |

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