Friday, June 12, 2020

Aroh Chapter 10 Poetry आरोह दसवां अध्याय काव्य भाग

विद्यार्थियों


आज हम आरोह पुस्तिका का अध्याय दसवां काव्य भाग -
छोटा मेरा खेत एवं बगुलो के पंख (कवि: उमाशंकर जोशी) करेंगे |


छोटा मेरा खेत
                                                कविता का सार
छोटा मेरा खेत कविता में उमाशंकर जोशी ने खेती के रूप के माध्यम से कवि-कर्म के प्रत्येक चरण
को बांधने का प्रयास किया है | उन्हें कागज का पन्ना, एक चकोर खेत की तरह लगता है | इस कागज
रूपी खेत में किसी भावनात्मक आंधी से बीज रूपी भाव बोया जाता है | यह बीज, रचना के भाव-विचार
को अभिव्यक्ति देने वाला है | इस बीज को कल्पना की सहायता से विकसित किया जाता है | इस
प्रक्रिया में बीज विगलित होता है | अंकुरित होता है, उसमें  शब्दों के अंकुर निकलते हैं | अतः वह
पुष्पित-पल्लवित होता है अर्थात वह कृति का रूप ग्रहण करता है | उस साहित्यिक कृति से जो
अलौकिक रस- धारा प्रवाहित होती है | वह उस क्षण में होने वाली रोपाई का परिणाम है | पर यह 
रस-धारा अनंत काल तक चलने वाली कटाई (साहित्य कालजई होता है और असंख्य पाठकों द्वारा
पढ़ा जाता है, उसका आनंद लिया जाता है) से कम नहीं होता | खेत में उत्पन्न होने वाला अन्य कुछ
समय के बाद समाप्त हो जाता है, किंतु साहित्य का रस कभी समाप्त नहीं होता | वह तो अक्षय बना
रहता है |


प्रश्न 1 - छोटे चौकोने खेत को कागज का पन्ना कहने से क्या है ?
उत्तर - 

कवि को कागज का पन्ना, जिस पर रचना शब्द बुद्ध होती है | एक चौकोर खेत की तरह लगती है |
कवि-ह्रदय  मैं जब भावनात्मक आवेग आता है, तो कागज पर रचना का मूल भाव अर्थात बीज पड़ता
है | तो बाद में शब्द बद्ध होकर रचना का रूप धारण करता है |

प्रश्न 2 - रस का अक्षय पात्र से कवि ने रचना कर्म की किन विशेषताओं की ओर इंगित किया है ? 
उत्तर - 
रस का अक्षय पात्र का अर्थ है, रस यानी आनंद का कभी समाप्त न होने वाला पात्र | इसमें रचना-कर्म
की निम्नलिखित विशेषताओं की ओर इंगित किया गया है | 
1)... रचना -कर्म द्वारा रचनाकार जिसे साहित्यिक कृति की रचना करता है, उसमें अलौकिक रस-धार
निकलती है |
2)... साहित्यिक कृति कालजई होती है इसका रस सदैव बना रहता है |
3)... असंख्य पाठकों द्वारा असंख्य बार पढ़े जाने पर भी उसका आनंद रूपी  रस कम नहीं होता |
4)... कृषि- कर्म से उत्पन्न उत्पन्न  अन्न का रस कुछ समय बाद समाप्त हो जाता है | किंतु रचना-कर्म
द्वारा रचित कालजई कृति का आनंद सदैव बना रहता है |

प्रश्न 3 - रचना के संदर्भ में अंधड़ और बीज क्या है ?
उत्तर -
रचना के संदर्भ में अंधड़ भावनात्मक आवेग है जिसके द्वारा कभी अपने मन के भावों, विचारों और
संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने का आधार बनाता है| “बीज” रचना के संदर्भ में, रचना का मूल भाव है |
जो कल्पना का सहारा पाकर विकसित होता है, और अंततः एक संपूर्ण  कृति का स्वरूप ग्रहण करता है | 
यह बीज रूपी भाव रचना के रूप में अभिव्यक्त होता है |

बगुलो के पंख
                                                कविता का सार
बगुलो के पंखकविता में कवि उमाशंकर जोशी प्राकृतिक सौंदर्य के प्रभाव को उत्पन्न करने के लिए 
अनेक युक्तियों का प्रयोग करते हैं | कवि आकाश में पंक्ति बनाकर उड़ते हुए सफेद बगुलो की पंक्ति
देखता है उस पर इस दृश्य का ऐसा प्रभाव पड़ता है कि वह उन उड़ते हुए बबलू को देखता ही रह जाता
है | उसे लगता है कि यह पंक्ति उसकी आंखें ही चुरा कर अपने साथ लिए जा रही है |काले बादलों से
आच्छादित अकाश में संध्या के समय तेज भरपूर सफेद शरीर तर रहे हैं | अर्थात काले बादलों से गिरे
आकाश में सफेद बगुलो के शरीर तैरते हुए प्रतीत होते हैं | यह दृश्य इतना आकर्षण लगता है कि कभी
सब कुछ भूल कर उसी में अटका रह जाता है | वह इस माया अर्थात इस आकर्षण में स्वयं को बचाने
की गुहार लगाता है |


प्रश्न 1 - कवि किसे रोककर रखना चाहता है और क्यों ?
उत्तर -

कवि साज के समय कजरारे बादलों से भरे आकाश में उड़ते बगुलो की पंक्तियां के सौंदर्य को रोककर
रखना चाहता है | उस दृश्य को देखने से उसका मन नहीं भरा वह चाहता है कि वह उस दृश्य को और
अधिक समय तक देखता रहे इसलिए वह उसे रोककर रखना चाहता है |


शुभकामनाओं सहित !

नीलम
35-मॉडल, चंडीगढ़ |

Aroh Chapter 9 Poetry आरोह नवां अध्याय काव्य भाग

विद्यार्थियों


आज हम आरोह पुस्तिका का अध्याय नवां काव्य भाग -
रुबाइयां एवं ग़ज़ल (कवि: फ़िराक गोरखपुरी) करेंगे |


रुबाइयां
                                                कविता का सार
यह रुबाइयां वात्सल्य रस से युक्त है | इनमें नन्हे शिशु की अठखेलियां, मां-बेटे कि कुछ मनमोहक
अदाएं तथा रक्षाबंधन का एक दृश्य प्रस्तुत है | इनका सार इस प्रकार है |


पहली रुबाई … मां अपने प्रिय शिशु को आंगन में लिए खड़ी है| कभी मां उसे हाथों पर  झूला रही
है | कभी हवा में लहराती है, मां की इस क्रियाते बच्चे को आनंद आ रहा है शिशु झूले खाकर खिलखिला
उठता है | हवा में बच्चे की हंसी गूंज उठती है |


दूसरी रुबाई ... कभी मां छलकते हुए जल से शिशु को नहलाती है | मां उसके उलझे बालों में कंघी
करती है |  मां अपने घुटनों में बिठाकर बड़े प्यार से कपड़े  पहनाती  है बच्चा अपनी मां के मुख को
निहारता रहता है |


तीसरी रुबाई ... दिवाली की शाम को पूरा घर सजा हुआ है | पूजा के लिए  चीनी के खिलौने रखे हैं |
इसी बीच रूपवती मां दमकते मुख से बच्चे के घरौंदे में भी दिया जलाती है | इन सभी क्रियाकलापों
के बीच भी मां अपने बच्चे के साथ परेशान है मां अपने बच्चे की दुनिया में ही मगन है जिसकी खुशी
उसके चेहरे पर चमक रही है |


चौथी रुबाई ... एक अन्य दृश्य है जहां शायर फ़िराक गोरखपुरी ने बाल हट का वर्णन किया है |
बच्चा आंगन में ठनक रहा है | वह चांद को हाथ में लेने की जिद कर बैठता है |  वह किसी भी तरह
मान नहीं रहा मां से मनाने बहलाने के लिए उसके हाथ में आईना पकड़ा कर उसे कहती है, कि देखो,
चांद आईने में उतर आया है अर्थात शीशे में चांद का प्रतिबिंब दिखाती है | कहती है यह लो शीशे में
चांद उतर आया है |


पांचवी रुबाई ... वर्षा ऋतु के प्राकृतिक दृश्य का साम्या रक्षाबंधन के पर्व से किया गया है | रक्षाबंधन
की सुबह है | आकाश में हल्की हल्की घटाएं छाई हुई हैं | आकाश में बिजली की चमक उसी तरह
दिखाई देती है | जैसे राखी के रेशमी गुच्छे की चमक | बहने अपने भाइयों को इसी प्रकार चमकती
हुई राखियां बांधती है |


प्रश्न 1 - रुबाइयां पाठ के आधार पर घर आंगन में दिवाली और राखी के दृश्य बिंब को अपने
शब्दों में समझाएं ?
                                                        अथवा
फ़िराक की रुबाइयो में घरेलू जीवन के बिंबो का सौंदर्य स्पष्ट कीजिए ?
उत्तर - 
दिवाली की एक शाम है | घर का आंगन  साफ- सुथरा और सजा- संवरा है | मां अपने बच्चे के लिए
चीनी मिट्टी के खिलौने से जाती हैं |  उनके बीच एक दिया भी जलाती है | बच्चा इससे प्रसन्न हो उठता है | 
इसी तरह राखी का दिन है, आसमान में बादलों की घटा छाई है | नन्ही गुड़िया पांव में पायजेब पहने रस
की पुतली सी जान पड़ती है | मैं प्रसन्नता पूर्वक भाई की कलाई पर राखी बांध रही है | अतः घरेलू जीवन
में यह  त्योहार बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं |


प्रश्न 2 - रुबाइयो  का भाव सौंदर्य स्पष्ट कीजिए ?
                      आंगन में ठनक रहा है जिद्आया है
                      बालक तो हुई चांद पर ललचाया है
                      दर्पण उसे देख कर कह रही है मां
                      देख आईने में चांद उतर आया है
उत्तर - 
वात्सल्य भाव का सुंदर वर्णन है | बाल सुलभ हट का अनूठा वर्णन किया गया है | बालक के लिए
आकाश का चांद एक मन लुभावना खिलौना है | वह उसे लेने की हट कर रहा है | मां हाथ में आईना
देखकर बच्चे को बहला रही है | देख आईने में चांद उतर आया है |


ग़ज़ल
                                                कविता का सार
फ़िराक गोरखपुरी की यह ग़ज़ल व्यक्तिगत प्रेम पर आधारित है यद्यपि ग़ज़ल का हर शेर स्वयं में
स्वतंत्र अर्थ रखता है | फिर भी पूरी ग़ज़ल में एक संगति है इसका सार इस प्रकार है |  


1)... ग़ज़ल के पहले शेयर में शायर बता रहा है- प्रकृति में नए रस से परिपूर्ण होकर कलियों की
पंखुड़ियां धीरे-धीरे अपने कोमल गांठे खोल रही हैं, अर्थात कलियां खिल का फूल बनाने को तैयार हैं |
कोमल कलियों का धीरे-धीरे खिलकर फूल बनना ऐसा लगता है, मानो कलियां फूल बनकर खिलने और
आसमान में अपना रंग और सुगंध बिखेरने के लिए उड़ जाने को तैयार हैं | फूलों की कलियों में नवरस
छलकने लगा है | चारों ओर सुगंध फैलने लगी है |


2)... आकाश में झिलमिलाते सितारे जब उदय होते हैं, तो सारा संसार सो जाता है | चारों ओर सन्नाटा
पसर जाता है | रात का यह सन्नाटा भी कुछ बोलता लगता है | जैसे चुपके चुपके हमें बहुत कुछ कह रहा हो | 


3)... अपने दर्द को व्यक्त करते हुए शायर अपने तथा अपनी किस्मत के संबंध में बताता कि हम दोनों
को रोने जैसा एक ही काम मिला है | हम दोनों एक दूसरे पर रो लेते हैं | यहां  शायर खराब किस्मत को
कोसता है और अपने प्रिया को याद करके रोता है | 


4)... शायर आगे कहता है, कि जो लोग मुझे बदनाम करने के लिए मेरी बातें करते हैं अर्थात मेरे बारे
में दूसरों को बताते हैं  मेरे रहस्यों को प्रकट करते हैं |  वह वास्तव में मुझे बदनाम नहीं कर रहे वह अपने
ही भेद खोल रहे हैं | अर्थात वह अपनी प्रकृति के बारे में बता रहे हैं कि वह कैसा है | अर्थात मुझे बदनाम
करने की बजाय वह स्वयं बदनाम हो रहे हैं | 


5)... अपने प्रेम के कारण विवेक महान कवि को दीवानगी की हद तक जाना पड़ा है, क्योंकि बुद्धि विवेक
के साथ तेरे संबंध के बारे में जब वह सोचता है, तो तेरा सौदा करने वाले या तेरे हुसन को तोड़ने वाले तो
दीवाने हैं | अर्थात मेरा प्यार तो इन सब चीजों से ऊपर है | 


6)... शायर के मन में विरह की पीड़ा भी है जो दुनियादारी का लिहाज भी है | इसलिए मैं तेरे बिछड़ने के
गम में चुपचाप रो लेता हूं ताकि किसी को हमारे प्रेम संबंधों का पता ना चले | अतः वह अपने दर्द को
चुपके चुपके रोकर प्रकट कर लेता है | 


7)... सुंदरिया और इश्क की दुनिया की यह आदत है कि वह दोनों में संतुलन बनाए रखता है | जो
व्यक्ति हुस्न और इश्क में संतुलन रखते हैं | उतना ही पाते हैं, जितना स्वयं को उसमें खो देते हैं | अर्थात
जो जितना स्वयं को खो देता है उतना ही गहरा प्रेम को पाता है |


8)...  शायर का हर एक शेर आंसुओं में डूबा हुआ है | आंखों की चमक दमक देखकर पता ही नहीं चलता
कि यह चमक शेरो शायरी के कारण आई है या आंसुओं के कारण क्योंकि दुनिया की चमक दमक के
बीच उनकी शायरी और विरह वेदना को महसूस करना जरूरी है | 


9)... शराबियों की महफिल में जब तू ( प्रेयसी) याद आती है तो मन प्रसन्न हो उठता है | तेरी पवित्रता
देखकर फरिश्ते भी शर्म आ जाते हैं, अर्थात रात के सूने पैर में जब फरिश्ते गुनाहों का लेखा-जोखा देख
रहे होते हैं, तब कभी को शराब की महफिल में बैठ कर अपनी प्रेयसी की याद आती है |


10)... शायर की शायरी करने की प्रेरणा मीर तकी से मिली जिसके कारण में इतनी बेहतरीन शायरी
लिख सके अर्थात फ़िराक गोरखपुरी  को इस बात का गर्व है | क्योंकि ग़ज़लों में भी मीर की ग़ज़ल ओं
का प्रभाव आ गया |


प्रश्न 1 - फ़िराक गोरखपुरी की ग़ज़ल वियोग शृंगार से कैसे संबंधित है स्पष्ट कीजिए? 
उत्तर -
ग़ज़ल उर्दू शायरी की एक महत्वपूर्ण विद्या है | इसमें प्रेम तथा सिंगार को अत्यधिक महत्व दिया जाता है |
श्रृंगार दो प्रकार के होते हैं- वियोग तथा संयोग | वियोग श्रृंगार को बिरह भी कहते हैं  फ़िराक गोरखपुरी की
इस ग़ज़ल में वियोग श्रृंगार का महत्व मिलता है | यह वियोग प्रेमिका के दूर रहने तथा प्रेम के कारण लोगों
द्वारा किए गए अपमान को सहने के कारण प्रकट हुआ है |


प्रश्न 2 - खुद का पर्दा खोलने से क्या आशय है ग़ज़ल पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए?
उत्तर -
खुद का पर्दा खोलने का आशा है अपने संबंध में अज्ञात बातों को बताना, भेद बताना | जब कोई व्यक्ति
किसी अन्य व्यक्ति की निंदा करता है, तो वह स्वयं अपनी निंदा करने की, बुराई करने की प्रवृत्ति को
उजागर करता है | इस प्रकार में स्वयं अपना भी तो पर्दा खोल रहा होता है |


शुभकामनाओं सहित !

नीलम
35-मॉडल, चंडीगढ़ |

Wednesday, June 10, 2020

Aroh Chapter 8 Poetry आरोह आठवां अध्याय काव्य भाग

विद्यार्थियों


आज हम आरोह पुस्तिका का अध्याय आठवां काव्य भाग -
कवितावली एवं लक्ष्मण मूर्छा और राम का विलाप (कवि: गोस्वामी तुलसीदास) करेंगे |


कवितावली
                                                कविता का सार
कवितावली के अंतर्गत तुलसीदास द्वारा रचित दो कविता और एक  सवैया  संकलित है | 


प्रथम कवित्त  किसीबी किसान . . . , मैं उन्होंने बताया है कि संसार के सद- असद, अच्छे- बुरे
सभी कार्यों का आधार जो है, वह भूख है | जिसका हल वे राम रूपी घनश्याम (मेघ) कृपा जल में
देखते हैं | उनकी रामभक्ति एक और जीवन के यथार्थ संकटों  को हल करने वाली है, तो दूसरी
और आध्यात्मिक क्षेत्र में मुक्ति प्रदान करने वाली है | कवि ने इस पद में समकालीन सामाजिक
दशा का चित्रण किया है | इस संसार में मजदूर, किसान, व्यवसायी, भट्, नट आदि सभी लोग
अपना पेट भरने के लिए अनेक प्रकार के कार्य करते हैं | इसके लिए लोग कठिन से कठिन
कार्य करते हैं | उचित अनुचित कार्य करते हैं धर्म अधर्म की चिंता नहीं करते यहां तक कि अपने
पुत्र पुत्रियों को भी बेच देते हैं | यह पेट की आग वन में लगी आग से भी बढ़कर है | इस विषम
अग्नि की शांति राम रूपी मेघ के कृपा रूपी जल से हो सकती है | 


दूसरे कवित्त  खेती न किसान . . . , में कवि ने प्रकृति और शासन की विषमता से उत्पन्न
विकारी व गरीबी का चित्रण किया है समाज में बेरोजगारी और गरीबी व्व्याप्त है | किसान को
खेती, भिखारी को भीख, व्यापारी को व्यापार और नौकर को नौकरी नहीं मिलती है | जीव का
से हीन लोग अत्यंत व्यथित वे परस्पर सोचते हैं, कि कहां जाएं? क्या करें? वेद, पुराण सभी यही
कहते हैं कि संकट को राम ही दूर करते हैं | कवि राम से प्रार्थना करते हैं कि हे राम ! इस दरिद्रता
रूपी रावण से आप ही  उबार सकते है | 


तीसरे कवित्त छंद सवैया . . . , मैं भक्तों के हृदय में भक्ति के कारण उत्पन्न आत्मविश्वास का
चित्रण किया गया है | जिससे समाज में व्यापक  जाति- पाति और धर्म के भेदभाव को नकारने
का सास उत्पन्न होता है | कभी कहता है कि कोई व्यक्ति क्या कहता है, उसे इसकी बिल्कुल
चिंता नहीं है | उस ना किसी से संबंध बिगड़ने हैं | उसे न तो किसी के साथ विवाह करना है | मैं
तो राम सेवक के रूप में प्रसिद्ध हो गया है इसलिए जो जैसा करना चाहे कहे ले | उसे तो मांग
कर खाना और मंदिर में सो जाना है | उसने किसी से कुछ लेना नहीं | किसी को कुछ देना नहीं
उसे तो राम भजन के अतिरिक्त कुछ नहीं अच्छा लगता |


प्रश्न 1 - कवितावली में उद्धृत छंदों के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास को अपने युग
की आर्थिक विषमता की अच्छी समझ है
उत्तर - 
तुलसीदास मानवीयता-संवेदना के कवि हैं | उन्होंने युगीन चेतना का सुंदर समावेश काव्य में
किया है | तुलसीदास के युग में समाज में आर्थिक विषमता व्याप्त थी | संसार की समस्त गतिविधियों
का आधार पेट की आग है | पेट की आग को शांत करने के लिए लोग अच्छे-बुरे कर्म, धर्म-अधर्म
आदि करते हैं | उनके युग में विकारी और गरीबी का बोलबाला था | विकारी और गरीबी के कारण
व्याकुल जनता एक दूसरे से पूछती है, कि हम कहां जाएं ? क्या करें ? लोगों को पेट भरने का कोई
रास्ता नहीं सूझता | इस आर्थिक विषमता का समाधान तुलसी को राम की कृपा में दिखाई देता है |
उसके अनुसार राम भक्ति पेट की आग बुझाने वाली, जीवन के यथार्थ संकटों का समाधान करने
वाली है | तुलसीदास को अपने युग की आर्थिक विषमता को अच्छी तरह समझ लिया था | तभी
उन्होंने अपने कविता में वर्णित योग के आधार पर ही यह सब कहां है |


प्रश्न 2 - पेट की आग का शमन  ईश्वर भक्ति का मेघ ही कर सकता है | तुलसी का यह
काव्य सत्य क्या इस समय काफी युग-सत्य है ? तर्कसंगत उत्तर दीजिए ?
उत्तर - 
तुलसीदास के युग में आर्थिक विषमता से त्रस्त लोगों को इस समस्या का समाधान राम-भक्ति
में दिखाई देता है | गरीबी और बेकारी की मार झेलते लोगों को केवल ईश्वर का सहारा, ईश्वर
के तुलसीदास के विश्वास को प्रकट करता है | विवशता में जब पेट की आग शांत करने का उपाय
नहीं सोचता तो लोग भगवान का सहारा लेते हैं | वह उस युग का काव्य -सत्य है |  
आधुनिक युग में भी गरीबी और बेकारी की समस्या से जूझते लोगों की पेट की आग जब किसी भी
प्रकार से नहीं बुझती तो वह भी सब कुछ भगवान के भरोसे छोड़ देते हैं | ईश्वर को ही अपने जीवन
के यथार्थ संकटों का समाधान करने वाला मानकर उसकी शरण में जाते हैं | इस प्रकार तुलसी के
युग का यह काव्य-सत्य इस समय का भी युग-सत्य है |


प्रश्न 3 - तुलसी ने यह कहने की जरूरत क्यों समझी ? धूत कहो, अवधूत कहो, राजपूत
कहो, जुलाहा कहो, काहू की बेटा से बेटी ना ब्याहब काहू की जाती बिगाड़ न सोओ, इस 
सवैया मे काहू के बेटा सो बेटी ना ब्याहब कहते तो सामाजिक अर्थ में क्या परिवर्तन
आता ?
उत्तर - 
तुलसीदास के युग में समाज में जात-पात और धार्मिक आधार पर भेदभाव प्रचलित था | स्वयं
तुलसीदास जी को अपने जीवन काल में अनेक कठिनाइयों  को सहन करना पड़ा पड़ा था | कुछ
लोगों ने ब्राह्मण नहीं मानते थे | उन्हें किसी राजपूत अथवा जुलाहे की संतान मानते थे | इसी
प्रकार कुछ लोग उनकी रामभक्ति को ढोंग बताते थे | और  कुछ उन्हें  बौद्ध धर्म का अनुयाई, तंत्र
मंत्र में निपुण साधु मानते थे | तुलसी ने अपने क्रोध तथा निराश की मन स्थिति को व्यक्त करने के
साथ-साथ उनकी जाति पाति पर प्रश्न उठाने वाले लोगों को मुंहतोड़ उत्तर देने के लिए यह सब कहने 
की आवश्यकता समझी होगी | 


तुलसी के समय युग में विवाह संबंध जाति विशेष करने पड़ते थे यदि लड़की ब्राह्मण जाति की है
तो विवाह भी ब्राह्मण कुल में ही करना पड़ता था ऐसी स्थिति में तुलसीदास जी जात पात का
तिरस्कार नहीं कर पाते | लोगों के उन्हें ब्राह्मण न मानने पर उन्हें अपनी कन्या का विवाह करने में
परेशानी आती | उन्हें अपनी जाति सिद्ध करनी पड़ती |


लक्ष्मण मूर्छा और राम का विलाप
                                                कविता का सार
तुलसीदास द्वारा रचित “रामचरितमानस” के लंका कांड से “लक्ष्मण -मूर्छा और राम का विलाप”
काव्यांश उद्धृत है | इस काव्यांश में शक्ति लगने पर लक्ष्मण के मूर्छित हो जाने पर व्यथित राम के
शोक का अत्यंत मार्मिक वर्णन हुआ है | साथ ही राम का अपने भाई लक्ष्मण के प्रति प्रेम व्यक्त हुआ है |


लक्ष्मण-मेघनाथ युद्ध मेंलक्ष्मण शक्ति लगने के कारण मूर्छित हो गए | हनुमान जी उनके लिए संजीवनी
बूटी लेने गए | जब वे संजीवनी बूटी लेकर अयोध्या के ऊपर से गुजर रहे थे, तो भरत ने उन्हें कोई राक्षस
समझकर बाण मारकर पृथ्वी पर गिरा दिया, किंतु हनुमान के मुख से राम राम का नाम सुनकर वे व्याकुल
हो उठे | होश में आने पर हनुमान ने उन्हें सारी कथा कह सुनाई | तब भरत ने उन्हें पर्वत सहित बान पर
बैठने को कहा ताकि वह समय पर आम के पास पहुंच सके |इस पर हनुमान जी भरत से कहते हैं |


हे नाथ ! हे प्रभु ! मैं आपका प्रताप हृदय में रख कर तुरंत चला जाऊंगा | फिर भरत के चरणों की वंदना
करके तथा आगे लेकर चल पड़े हनुमान भरत के स्वभाव की तथा राम के प्रति उनके अगाध प्रेम की मन
ही मन प्रशंसा करते हुए चले जा रहे हैं | उधर लक्ष्मण को अचेत देखकर श्रीराम सधारण मनुष्य की तरह
विलाप करने लगे |  उन्हें इस बात की चिंता थी कि आधी रात बीत चुकी है, किंतु हनुमान अभी तक
नहीं आए | राम विलाप करते हुए कहने लगे- हे भाई तुम मुझे दुखी नहीं देख सकते थे | अब वह प्रेम
कहां गया ? तुम उठते क्यों नहीं हो ? यदि मुझे यह पता होता कि वन में भाई से भी बिछड़ना पड़ेगा,
तो मैं पिता की आज्ञा ही नहीं मानता | पुत्र- धन, स्त्री- धन और परिवार तो संसार में बार-बार मिल जाते
हैं, किंतु सहोदर भाई नहीं मिलता | तुम्हारे बिना मेरा जीवन व्यर्थ है | स्त्री के लिए प्यारे भाई को खोकर
में अयोध्या कैसे  लौटूंगा | मेरा कठोर हृदय अपयश और शोक दोनों सहन करेगा | तुम अपनी माता के
एक ही पुत्र हो | मैं उन्हें क्या उत्तर दूंगा | यह सोचकर राम की आंखों में आंसू बहने लगे | वे साधारण
मनुष्य की तरह विलाप करने लगे | 


प्रभु राम के विलाप को सुनकर सारे वानर व्याकुल हो उठे इतने में हनुमान आ गए|  प्रसन्न होकर राम
ने हनुमान से भेंट की, वैद्य सुषेण ने तुरंत उपचार किया और लक्ष्मण जी स्वस्थ होकर उठ बैठे | प्रभु राम,
लक्ष्मण से गले मिले सारे वानर प्रसन्न हो उठे | हनुमान जी देश विशेष वैद्य को उनके घर पहुंचा दिया |
यह समाचार जब रावण ने सुना तो मैं व्याकुल होकर कुंभकरण के पास पहुंचा, और उसे नींद से
जगाया | कुंभकरण ने रावण से उसे  जगाने  का कारण पूछा, तब रावण ने सीता हरण की सारी कथा
कह सुनाई और बताया कि वानरों ने बड़े-बड़े राक्षसों को मार डाला | रावण के वचन सुनकर कुंभकरण
ने कहा, जगत जननी जानकी का हरण करने के बाद भी मूर्ख अपना कल्याण चाहता है | यह असंभव है |


प्रश्न 1 - भ्रातृ शोक में हुई राम की दशा को कवि ने प्रभु की नर लीला की उपेक्षा सच्ची
मानवीय अनुभूति के रूप में रचा है क्या आप इससे सहमत हैं ? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए |
उत्तर - 
हम इस बात से पूर्णता सहमत हैं की रात्रि चौक में हुई राम की दशा को कवि ने प्रभु की नर लीला की
अपेक्षा सच्ची मानवीय अनुभूति के रूप में अभिव्यक्ति दी है | लक्ष्मण शक्ति बाण लगने से मूर्छित हो
जाते हैं | राम उन्हें देखकर सामान्य मनुष्य की भांति व्याकुल हो उठते हैं | हनुमान उनके उपचार के लिए
संजीवनी बूटी लेने जाते हैं | हनुमान के आधी रात तक ना लौटने पर राम अधीर होकर विलाप करने
लगते हैं | उनका विलाप धीरे-धीरे प्रलाप में बदल जाता है | सामान्य मानव की भांति राम अपना धैर्य
खो देते हैं | उन्हें लक्ष्मण के गुण, त्याग, स्वभाव आदि कस्मरण होने लगता है, वे भाववेग मैं यहां तक
कह जाते हैं, कि यदि उन्हें ज्ञात होता कि वन में भाई से हाथ धोना पड़ेगा तो वह पिता की आज्ञा को
नहीं मानते |इतना ही नहीं वह सीता की तुलना में भाई को अधिक महत्व देते हैं | |इस प्रसंग में कवि
ने ईश्वर या राम का पूरी तरह से मानवीकरण किया है | जिससे प्रसंग पूर्ण रूप से करुणनिक हो उठा
है | राम भी साधारण मनुष्य की भांति प्रिया जान की मृत्यु की आशंका से व्याकुल, अधीर होकर
विलाप प्रलाप करते हैं पलसर सारा वातावरण करुणामय हो उठता है |


प्रश्न 2 - लक्ष्मण- मूर्छा और राम का विलाप पाठ के आधार पर कुंभकरण का चरित्र
चित्रण कीजिए?
उत्तर - 
कुंभकरण लंकापति रावण का छोटा भाई था वह वीर, साहसी, बुद्धिमान, विवेकी, धैर्यवान, दूरदर्शी
होने के साथ-साथ नारियों का सम्मान भी करता था | धर्म, नीति, राजनीति आदि क्षेत्रों पर भी उसकी
अच्छी पकड़ थी | उसे अच्छे- बुरे का विभेद करने की शक्ति प्राप्त थी | कुंभकरण द्वारा सीता हरण
को गलत बताना और रावण को उन्हें सह सम्मान राम को सौंप देने का सुझाव देना | निश्चय ही
उसके चरित्रवान व समझदार होने को दर्शाता है |


प्रश्न 3 - शोक ग्रस्त वातावरण में हनुमान के अवतरण को करुण रस के बीच वीर रस का
आविर्भाव क्यों कहा गया है?
उत्तर - 
लक्ष्मण-मूर्छित के पश्चात समस्त माहौल शोक ग्रस्त हो गया था | राम लक्ष्मण को अपने हृदय से
लगाकर फूट-फूट कर रो रहे थे | इसके साथ-साथ समस्त भालू, वानर सेना भी राम को देखकर
अत्यंत दुखी थी | यहां तक कि राम सेना का प्रत्येक प्राणी, वीर शोक- मगन था | श्रीराम तो सामान्य
मनुष्यों की भांति कर करुण अवस्था में पहुंच गए थे | वह बार-बार लक्ष्मण को अनेक बातों से याद
करके रो रहे थे |लेकिन जैसे ही हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर पहुंचे तो पूरा का पूरा पर्वत ही
उन्होंने अपने हाथ पर उठाया हुआ था| तो हनुमान जी को देखकर समस्त वानर सेना करुणा से वीर
रस में बदल गई और शीघ्र ही वैद्य जी के इलाज से लक्ष्मण स्वस्थ हो गए | लक्ष्मण हर्षित होकर
उठ खड़े हुए | राम सहित समस्त वानर सेना खुश हो गई | इस प्रकार शोक ग्रस्त माहौल में हनुमान
के आगमन को वीर रस का आविर्भाव कहा गया है |


शुभकामनाओं सहित !

नीलम
35-मॉडल, चंडीगढ़ |