Sunday, June 7, 2020

Aroh Chapter 8 Literature आरोह आठवां अध्याय गद्य भाग

विद्यार्थियों!

आज हम आरोह पुस्तिका का आठवां अध्याय
गद्य भाग -
श्रम विभाजन और जाति प्रथा (लेखक: बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर) करेंगे |


प्रश्न 1 - जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप ना मानने के पीछे अंबेडकर के क्या
तर्क हैं ? 
उत्तर - 
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के अनुसार जाति- प्रथा श्रम-विभाजन का आधार नहीं हो सकती, क्योंकि
यह श्रम-विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी रूप लिए हुए हैं | यह व्यवस्था श्रमिकों का
विभिन्न वर्गों में आस्वभाविक विभाजन करती है | इतना ही नहीं जाति- प्रथा विभाजित वर्गों को
एक-दूसरे की उपेक्षा ऊंच-नीच भी घोषित करती है | अतः जाति -प्रथा श्रम -विभाजन का एक रूप
नहीं हो सकती |


प्रश्न 2 - जाति-प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी और भुखमरी का भी एक कारण कैसे
बनती रही है ? क्या यह स्थिति आज भी है ?
उत्तर -
जाति-प्रथा गर्भधारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर देती है | साथ ही उसे जीवनभर
के लिए पेशे में भी बांध देती है | भले ही पैसा अनुपयुक्त या अपर्याप्त क्यों ना हो | यह मन अनुमति
ऐसी स्थिति में व्यक्ति भूखों मर जाता है | आधुनिक युग में उद्योग धंधों की प्रक्रिया व तकनीक में
निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन हो जाता है, और व्यक्ति बेरोजगार हो जाता है |
इस प्रकार जाति -प्रथा पेशा बदलने की अनुमति न देकर भारत में बेरोजगारी और भुखमरी का कारण
बनती है | आज भयंकर जाति - प्रथा के बाद भी ऐसी बाध्यता नहीं है | लोग पैतृक व्यवसाय त्याग
कर नए पेशे में जा रहे हैं | जो लोग पैतृक व्यवसाय से ही जुड़े हैं | वह या तो स्वेच्छा से हैं अन्यथा
अन्य क्षेत्र की दक्षता के अभाव के कारण भी कार्य कर रहे हैं | 


प्रश्न 3-  लेखक के मत में दासता की व्यापक परिभाषा क्या है ?
उत्तर - 
लेखक के मतानुसार-- यदि व्यक्ति को अपने व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता ना हो, तो वह दास है |
दासता केवल कानूनी पराधीनता ही नहीं है, अपितु कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों द्वारा निर्धारित
व्यवहार तथा कर्तव्य का पालन करने के लिए विवश होना भी है | उदाहरणार्थ जाति प्रथा की तरह
ऐसे वर्ग का होना संभव है | जहां कुछ लोगों को अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे अपनाने पड़ते हैं |


प्रश्न 4 - शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्य में असमानता 
संभावित रहने के बावजूद अंबेडकर समता  को एक व्यवहार या सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों
करते हैं? इसके पीछे उनके क्या तर्क हैं ?
उत्तर - 
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर यह जानते हुए कि शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक परंपरा की दृष्टि
से मनुष्यों में असमानता का होना संभव है | समता के व्यवहार यह सिद्धांत को मानने का आग्रह
करते हैं | इसके पीछे लेखक का तर्क यह है कि समाज को यदि अपने सदस्यों में अधिकतम
उपयोगिता प्राप्त करनी है, तो समाज के सभी सदस्यों को आरंभ से ही समान अवसर एवं समान
व्यवहार उपलब्ध कराए जाएं | राजनीतिज्ञों को भी सब मनुष्यों के साथ समान व्यवहार करना
चाहिए | प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता का विकास करने के लिए बराबर अवसर देने चाहिए |
उनका यह तर्क वंश में जन्म लेना या सामाजिक परंपरा व्यक्ति के वश में नहीं है | अतः उस आधार
पर निर्णय लेना उचित नहीं है | 


प्रश्न 5 - डॉक्टर अंबेडकर के जीवन का क्या उद्देश्य था ?
उत्तर -
डॉक्टर अंबेडकर का जन्म एक दलित परिवार में होने के कारण उन्हें जीवन भर शोषण एवं प्रताड़ना
झेलनी पड़ी | उन्होंने विदेश में उच्च शिक्षा ग्रहण की उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य दलितों का उद्धार
करना था | जीवन की अंतिम सांस तक वे दलितों के अधिकारों के लिए लड़ते रहे | उन्होंने दलितों के
उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया |


प्रश्न 6 - दासता केवल कानूनी पराधीनता ही नहीं है, पाठ श्रम विभाजन और जाति प्रथा के 
आधार पर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की विचारधारा को स्पष्ट कीजिए ?
उत्तर - 
दासता केवल कानूनी प्रधानता को ही नहीं कहा गया, बल्कि दास्तां में वह स्थिति भी शामिल है,
जिसमें कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों द्वारा निर्धारित व्यवहार एवं कर्तव्य का पालन करने के
लिए विवश होना पड़ता है | जिसके फल स्वरूप वह मानसिक रूप से संतुष्टि का जीवन व्यतीत
नहीं कर पाता |


प्रश्न 7 - श्रम विभाजन और जाति प्रथा पाठ में डॉक्टर अंबेडकर अपनी कल्पना में समाज
का कैसा रूप देखते हैं ?
उत्तर -
डॉ आंबेडकर की कल्पना का आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता और भाईचारे पर आधारित है | 
उनके आदर्श समाज में जातीय भेद-भाव का तो नामोनिशान ही नहीं है | इस आदर्श समाज में करने
पर बल दिया जाता है, कथनी पर नहीं |


प्रश्न 8 - श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा पाठ में डॉक्टर अंबेडकर ने मानव क्षमता को किन
तीन बातों पर निर्भर बताया है?
उत्तर -
मनुष्य की क्षमता अनुसार निम्नलिखित इन बातों पर निर्भर है -
i) शारीरिक वंश परंपरा |
ii) सामाजिक उत्तराधिकार अर्थात सामाजिक परंपरा के अनुरूप में माता पिता के कल्याण
   की कामना शिक्षा तथा वैज्ञानिक  ज्ञानार्जन आदि |
iii) मनुष्य के अपने प्रयत्न |


शुभकामनाओं सहित !

नीलम
35-मॉडल, चंडीगढ़ |

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