विद्यार्थियों
आज हम आरोह पुस्तिका का अध्याय आठवां काव्य भाग -
कवितावली एवं लक्ष्मण मूर्छा और राम का विलाप (कवि: गोस्वामी तुलसीदास) करेंगे |
कवितावली
कविता का सार
कवितावली के अंतर्गत तुलसीदास द्वारा रचित दो कविता और एक सवैया संकलित है |
प्रथम कवित्त किसीबी किसान . . . , मैं उन्होंने बताया है कि संसार के सद- असद, अच्छे- बुरे
सभी कार्यों का आधार जो है, वह भूख है | जिसका हल वे राम रूपी घनश्याम (मेघ) कृपा जल में
देखते हैं | उनकी रामभक्ति एक और जीवन के यथार्थ संकटों को हल करने वाली है, तो दूसरी
और आध्यात्मिक क्षेत्र में मुक्ति प्रदान करने वाली है | कवि ने इस पद में समकालीन सामाजिक
दशा का चित्रण किया है | इस संसार में मजदूर, किसान, व्यवसायी, भट्, नट आदि सभी लोग
अपना पेट भरने के लिए अनेक प्रकार के कार्य करते हैं | इसके लिए लोग कठिन से कठिन
कार्य करते हैं | उचित अनुचित कार्य करते हैं धर्म अधर्म की चिंता नहीं करते यहां तक कि अपने
पुत्र पुत्रियों को भी बेच देते हैं | यह पेट की आग वन में लगी आग से भी बढ़कर है | इस विषम
अग्नि की शांति राम रूपी मेघ के कृपा रूपी जल से हो सकती है |
दूसरे कवित्त खेती न किसान . . . , में कवि ने प्रकृति और शासन की विषमता से उत्पन्न
विकारी व गरीबी का चित्रण किया है समाज में बेरोजगारी और गरीबी व्व्याप्त है | किसान को
खेती, भिखारी को भीख, व्यापारी को व्यापार और नौकर को नौकरी नहीं मिलती है | जीव का
से हीन लोग अत्यंत व्यथित वे परस्पर सोचते हैं, कि कहां जाएं? क्या करें? वेद, पुराण सभी यही
कहते हैं कि संकट को राम ही दूर करते हैं | कवि राम से प्रार्थना करते हैं कि हे राम ! इस दरिद्रता
रूपी रावण से आप ही उबार सकते है |
तीसरे कवित्त छंद सवैया . . . , मैं भक्तों के हृदय में भक्ति के कारण उत्पन्न आत्मविश्वास का
चित्रण किया गया है | जिससे समाज में व्यापक जाति- पाति और धर्म के भेदभाव को नकारने
का सास उत्पन्न होता है | कभी कहता है कि कोई व्यक्ति क्या कहता है, उसे इसकी बिल्कुल
चिंता नहीं है | उस ना किसी से संबंध बिगड़ने हैं | उसे न तो किसी के साथ विवाह करना है | मैं
तो राम सेवक के रूप में प्रसिद्ध हो गया है इसलिए जो जैसा करना चाहे कहे ले | उसे तो मांग
कर खाना और मंदिर में सो जाना है | उसने किसी से कुछ लेना नहीं | किसी को कुछ देना नहीं
उसे तो राम भजन के अतिरिक्त कुछ नहीं अच्छा लगता |
प्रश्न 1 - कवितावली में उद्धृत छंदों के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास को अपने युग
की आर्थिक विषमता की अच्छी समझ है |
उत्तर -
तुलसीदास मानवीयता-संवेदना के कवि हैं | उन्होंने युगीन चेतना का सुंदर समावेश काव्य में
किया है | तुलसीदास के युग में समाज में आर्थिक विषमता व्याप्त थी | संसार की समस्त गतिविधियों
का आधार पेट की आग है | पेट की आग को शांत करने के लिए लोग अच्छे-बुरे कर्म, धर्म-अधर्म
आदि करते हैं | उनके युग में विकारी और गरीबी का बोलबाला था | विकारी और गरीबी के कारण
व्याकुल जनता एक दूसरे से पूछती है, कि हम कहां जाएं ? क्या करें ? लोगों को पेट भरने का कोई
रास्ता नहीं सूझता | इस आर्थिक विषमता का समाधान तुलसी को राम की कृपा में दिखाई देता है |
उसके अनुसार राम भक्ति पेट की आग बुझाने वाली, जीवन के यथार्थ संकटों का समाधान करने
वाली है | तुलसीदास को अपने युग की आर्थिक विषमता को अच्छी तरह समझ लिया था | तभी
उन्होंने अपने कविता में वर्णित योग के आधार पर ही यह सब कहां है |
प्रश्न 2 - पेट की आग का शमन ईश्वर भक्ति का मेघ ही कर सकता है | तुलसी का यह
काव्य सत्य क्या इस समय काफी युग-सत्य है ? तर्कसंगत उत्तर दीजिए ?
उत्तर -
तुलसीदास के युग में आर्थिक विषमता से त्रस्त लोगों को इस समस्या का समाधान राम-भक्ति
में दिखाई देता है | गरीबी और बेकारी की मार झेलते लोगों को केवल ईश्वर का सहारा, ईश्वर
के तुलसीदास के विश्वास को प्रकट करता है | विवशता में जब पेट की आग शांत करने का उपाय
नहीं सोचता तो लोग भगवान का सहारा लेते हैं | वह उस युग का काव्य -सत्य है |
आधुनिक युग में भी गरीबी और बेकारी की समस्या से जूझते लोगों की पेट की आग जब किसी भी
प्रकार से नहीं बुझती तो वह भी सब कुछ भगवान के भरोसे छोड़ देते हैं | ईश्वर को ही अपने जीवन
के यथार्थ संकटों का समाधान करने वाला मानकर उसकी शरण में जाते हैं | इस प्रकार तुलसी के
युग का यह काव्य-सत्य इस समय का भी युग-सत्य है |
प्रश्न 3 - तुलसी ने यह कहने की जरूरत क्यों समझी ? धूत कहो, अवधूत कहो, राजपूत
कहो, जुलाहा कहो, काहू की बेटा से बेटी ना ब्याहब काहू की जाती बिगाड़ न सोओ, इस
सवैया मे काहू के बेटा सो बेटी ना ब्याहब कहते तो सामाजिक अर्थ में क्या परिवर्तन
आता ?
उत्तर -
तुलसीदास के युग में समाज में जात-पात और धार्मिक आधार पर भेदभाव प्रचलित था | स्वयं
तुलसीदास जी को अपने जीवन काल में अनेक कठिनाइयों को सहन करना पड़ा पड़ा था | कुछ
लोगों ने ब्राह्मण नहीं मानते थे | उन्हें किसी राजपूत अथवा जुलाहे की संतान मानते थे | इसी
प्रकार कुछ लोग उनकी रामभक्ति को ढोंग बताते थे | और कुछ उन्हें बौद्ध धर्म का अनुयाई, तंत्र
मंत्र में निपुण साधु मानते थे | तुलसी ने अपने क्रोध तथा निराश की मन स्थिति को व्यक्त करने के
साथ-साथ उनकी जाति पाति पर प्रश्न उठाने वाले लोगों को मुंहतोड़ उत्तर देने के लिए यह सब कहने
की आवश्यकता समझी होगी |
तुलसी के समय युग में विवाह संबंध जाति विशेष करने पड़ते थे यदि लड़की ब्राह्मण जाति की है
तो विवाह भी ब्राह्मण कुल में ही करना पड़ता था ऐसी स्थिति में तुलसीदास जी जात पात का
तिरस्कार नहीं कर पाते | लोगों के उन्हें ब्राह्मण न मानने पर उन्हें अपनी कन्या का विवाह करने में
परेशानी आती | उन्हें अपनी जाति सिद्ध करनी पड़ती |
लक्ष्मण मूर्छा और राम का विलाप
कविता का सार
तुलसीदास द्वारा रचित “रामचरितमानस” के लंका कांड से “लक्ष्मण -मूर्छा और राम का विलाप”
काव्यांश उद्धृत है | इस काव्यांश में शक्ति लगने पर लक्ष्मण के मूर्छित हो जाने पर व्यथित राम के
शोक का अत्यंत मार्मिक वर्णन हुआ है | साथ ही राम का अपने भाई लक्ष्मण के प्रति प्रेम व्यक्त हुआ है |
लक्ष्मण-मेघनाथ युद्ध मेंलक्ष्मण शक्ति लगने के कारण मूर्छित हो गए | हनुमान जी उनके लिए संजीवनी
बूटी लेने गए | जब वे संजीवनी बूटी लेकर अयोध्या के ऊपर से गुजर रहे थे, तो भरत ने उन्हें कोई राक्षस
समझकर बाण मारकर पृथ्वी पर गिरा दिया, किंतु हनुमान के मुख से राम राम का नाम सुनकर वे व्याकुल
हो उठे | होश में आने पर हनुमान ने उन्हें सारी कथा कह सुनाई | तब भरत ने उन्हें पर्वत सहित बान पर
बैठने को कहा ताकि वह समय पर आम के पास पहुंच सके |इस पर हनुमान जी भरत से कहते हैं |
हे नाथ ! हे प्रभु ! मैं आपका प्रताप हृदय में रख कर तुरंत चला जाऊंगा | फिर भरत के चरणों की वंदना
करके तथा आगे लेकर चल पड़े हनुमान भरत के स्वभाव की तथा राम के प्रति उनके अगाध प्रेम की मन
ही मन प्रशंसा करते हुए चले जा रहे हैं | उधर लक्ष्मण को अचेत देखकर श्रीराम सधारण मनुष्य की तरह
विलाप करने लगे | उन्हें इस बात की चिंता थी कि आधी रात बीत चुकी है, किंतु हनुमान अभी तक
नहीं आए | राम विलाप करते हुए कहने लगे- हे भाई तुम मुझे दुखी नहीं देख सकते थे | अब वह प्रेम
कहां गया ? तुम उठते क्यों नहीं हो ? यदि मुझे यह पता होता कि वन में भाई से भी बिछड़ना पड़ेगा,
तो मैं पिता की आज्ञा ही नहीं मानता | पुत्र- धन, स्त्री- धन और परिवार तो संसार में बार-बार मिल जाते
हैं, किंतु सहोदर भाई नहीं मिलता | तुम्हारे बिना मेरा जीवन व्यर्थ है | स्त्री के लिए प्यारे भाई को खोकर
में अयोध्या कैसे लौटूंगा | मेरा कठोर हृदय अपयश और शोक दोनों सहन करेगा | तुम अपनी माता के
एक ही पुत्र हो | मैं उन्हें क्या उत्तर दूंगा | यह सोचकर राम की आंखों में आंसू बहने लगे | वे साधारण
मनुष्य की तरह विलाप करने लगे |
प्रभु राम के विलाप को सुनकर सारे वानर व्याकुल हो उठे इतने में हनुमान आ गए| प्रसन्न होकर राम
ने हनुमान से भेंट की, वैद्य सुषेण ने तुरंत उपचार किया और लक्ष्मण जी स्वस्थ होकर उठ बैठे | प्रभु राम,
लक्ष्मण से गले मिले सारे वानर प्रसन्न हो उठे | हनुमान जी देश विशेष वैद्य को उनके घर पहुंचा दिया |
यह समाचार जब रावण ने सुना तो मैं व्याकुल होकर कुंभकरण के पास पहुंचा, और उसे नींद से
जगाया | कुंभकरण ने रावण से उसे जगाने का कारण पूछा, तब रावण ने सीता हरण की सारी कथा
कह सुनाई और बताया कि वानरों ने बड़े-बड़े राक्षसों को मार डाला | रावण के वचन सुनकर कुंभकरण
ने कहा, जगत जननी जानकी का हरण करने के बाद भी मूर्ख अपना कल्याण चाहता है | यह असंभव है |
प्रश्न 1 - भ्रातृ शोक में हुई राम की दशा को कवि ने प्रभु की नर लीला की उपेक्षा सच्ची
मानवीय अनुभूति के रूप में रचा है क्या आप इससे सहमत हैं ? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए |
उत्तर -
हम इस बात से पूर्णता सहमत हैं की रात्रि चौक में हुई राम की दशा को कवि ने प्रभु की नर लीला की
अपेक्षा सच्ची मानवीय अनुभूति के रूप में अभिव्यक्ति दी है | लक्ष्मण शक्ति बाण लगने से मूर्छित हो
जाते हैं | राम उन्हें देखकर सामान्य मनुष्य की भांति व्याकुल हो उठते हैं | हनुमान उनके उपचार के लिए
संजीवनी बूटी लेने जाते हैं | हनुमान के आधी रात तक ना लौटने पर राम अधीर होकर विलाप करने
लगते हैं | उनका विलाप धीरे-धीरे प्रलाप में बदल जाता है | सामान्य मानव की भांति राम अपना धैर्य
खो देते हैं | उन्हें लक्ष्मण के गुण, त्याग, स्वभाव आदि कस्मरण होने लगता है, वे भाववेग मैं यहां तक
कह जाते हैं, कि यदि उन्हें ज्ञात होता कि वन में भाई से हाथ धोना पड़ेगा तो वह पिता की आज्ञा को
नहीं मानते |इतना ही नहीं वह सीता की तुलना में भाई को अधिक महत्व देते हैं | |इस प्रसंग में कवि
ने ईश्वर या राम का पूरी तरह से मानवीकरण किया है | जिससे प्रसंग पूर्ण रूप से करुणनिक हो उठा
है | राम भी साधारण मनुष्य की भांति प्रिया जान की मृत्यु की आशंका से व्याकुल, अधीर होकर
विलाप प्रलाप करते हैं पलसर सारा वातावरण करुणामय हो उठता है |
प्रश्न 2 - लक्ष्मण- मूर्छा और राम का विलाप पाठ के आधार पर कुंभकरण का चरित्र
चित्रण कीजिए?
उत्तर -
कुंभकरण लंकापति रावण का छोटा भाई था वह वीर, साहसी, बुद्धिमान, विवेकी, धैर्यवान, दूरदर्शी
होने के साथ-साथ नारियों का सम्मान भी करता था | धर्म, नीति, राजनीति आदि क्षेत्रों पर भी उसकी
अच्छी पकड़ थी | उसे अच्छे- बुरे का विभेद करने की शक्ति प्राप्त थी | कुंभकरण द्वारा सीता हरण
को गलत बताना और रावण को उन्हें सह सम्मान राम को सौंप देने का सुझाव देना | निश्चय ही
उसके चरित्रवान व समझदार होने को दर्शाता है |
प्रश्न 3 - शोक ग्रस्त वातावरण में हनुमान के अवतरण को करुण रस के बीच वीर रस का
आविर्भाव क्यों कहा गया है?
उत्तर -
लक्ष्मण-मूर्छित के पश्चात समस्त माहौल शोक ग्रस्त हो गया था | राम लक्ष्मण को अपने हृदय से
लगाकर फूट-फूट कर रो रहे थे | इसके साथ-साथ समस्त भालू, वानर सेना भी राम को देखकर
अत्यंत दुखी थी | यहां तक कि राम सेना का प्रत्येक प्राणी, वीर शोक- मगन था | श्रीराम तो सामान्य
मनुष्यों की भांति कर करुण अवस्था में पहुंच गए थे | वह बार-बार लक्ष्मण को अनेक बातों से याद
करके रो रहे थे |लेकिन जैसे ही हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर पहुंचे तो पूरा का पूरा पर्वत ही
उन्होंने अपने हाथ पर उठाया हुआ था| तो हनुमान जी को देखकर समस्त वानर सेना करुणा से वीर
रस में बदल गई और शीघ्र ही वैद्य जी के इलाज से लक्ष्मण स्वस्थ हो गए | लक्ष्मण हर्षित होकर
उठ खड़े हुए | राम सहित समस्त वानर सेना खुश हो गई | इस प्रकार शोक ग्रस्त माहौल में हनुमान
के आगमन को वीर रस का आविर्भाव कहा गया है |
शुभकामनाओं सहित !
नीलम
35-मॉडल, चंडीगढ़ |
35-मॉडल, चंडीगढ़ |
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