विद्यार्थियों
आज हम आरोह पुस्तिका का अध्याय नवां काव्य भाग -
रुबाइयां एवं ग़ज़ल (कवि: फ़िराक गोरखपुरी) करेंगे |
रुबाइयां
कविता का सार
यह रुबाइयां वात्सल्य रस से युक्त है | इनमें नन्हे शिशु की अठखेलियां, मां-बेटे कि कुछ मनमोहक
अदाएं तथा रक्षाबंधन का एक दृश्य प्रस्तुत है | इनका सार इस प्रकार है |
पहली रुबाई … मां अपने प्रिय शिशु को आंगन में लिए खड़ी है| कभी मां उसे हाथों पर झूला रही
है | कभी हवा में लहराती है, मां की इस क्रियाते बच्चे को आनंद आ रहा है शिशु झूले खाकर खिलखिला
उठता है | हवा में बच्चे की हंसी गूंज उठती है |
दूसरी रुबाई ... कभी मां छलकते हुए जल से शिशु को नहलाती है | मां उसके उलझे बालों में कंघी
करती है | मां अपने घुटनों में बिठाकर बड़े प्यार से कपड़े पहनाती है बच्चा अपनी मां के मुख को
निहारता रहता है |
तीसरी रुबाई ... दिवाली की शाम को पूरा घर सजा हुआ है | पूजा के लिए चीनी के खिलौने रखे हैं |
इसी बीच रूपवती मां दमकते मुख से बच्चे के घरौंदे में भी दिया जलाती है | इन सभी क्रियाकलापों
के बीच भी मां अपने बच्चे के साथ परेशान है मां अपने बच्चे की दुनिया में ही मगन है जिसकी खुशी
उसके चेहरे पर चमक रही है |
चौथी रुबाई ... एक अन्य दृश्य है जहां शायर फ़िराक गोरखपुरी ने बाल हट का वर्णन किया है |
बच्चा आंगन में ठनक रहा है | वह चांद को हाथ में लेने की जिद कर बैठता है | वह किसी भी तरह
मान नहीं रहा मां से मनाने बहलाने के लिए उसके हाथ में आईना पकड़ा कर उसे कहती है, कि देखो,
चांद आईने में उतर आया है अर्थात शीशे में चांद का प्रतिबिंब दिखाती है | कहती है यह लो शीशे में
चांद उतर आया है |
पांचवी रुबाई ... वर्षा ऋतु के प्राकृतिक दृश्य का साम्या रक्षाबंधन के पर्व से किया गया है | रक्षाबंधन
की सुबह है | आकाश में हल्की हल्की घटाएं छाई हुई हैं | आकाश में बिजली की चमक उसी तरह
दिखाई देती है | जैसे राखी के रेशमी गुच्छे की चमक | बहने अपने भाइयों को इसी प्रकार चमकती
हुई राखियां बांधती है |
प्रश्न 1 - रुबाइयां पाठ के आधार पर घर आंगन में दिवाली और राखी के दृश्य बिंब को अपने
शब्दों में समझाएं ?
अथवा
फ़िराक की रुबाइयो में घरेलू जीवन के बिंबो का सौंदर्य स्पष्ट कीजिए ?
उत्तर -
दिवाली की एक शाम है | घर का आंगन साफ- सुथरा और सजा- संवरा है | मां अपने बच्चे के लिए
चीनी मिट्टी के खिलौने से जाती हैं | उनके बीच एक दिया भी जलाती है | बच्चा इससे प्रसन्न हो उठता है |
इसी तरह राखी का दिन है, आसमान में बादलों की घटा छाई है | नन्ही गुड़िया पांव में पायजेब पहने रस
की पुतली सी जान पड़ती है | मैं प्रसन्नता पूर्वक भाई की कलाई पर राखी बांध रही है | अतः घरेलू जीवन
में यह त्योहार बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं |
प्रश्न 2 - रुबाइयो का भाव सौंदर्य स्पष्ट कीजिए ?
आंगन में ठनक रहा है जिद्आया है
बालक तो हुई चांद पर ललचाया है
दर्पण उसे देख कर कह रही है मां
देख आईने में चांद उतर आया है
उत्तर -
वात्सल्य भाव का सुंदर वर्णन है | बाल सुलभ हट का अनूठा वर्णन किया गया है | बालक के लिए
आकाश का चांद एक मन लुभावना खिलौना है | वह उसे लेने की हट कर रहा है | मां हाथ में आईना
देखकर बच्चे को बहला रही है | देख आईने में चांद उतर आया है |
ग़ज़ल
कविता का सार
फ़िराक गोरखपुरी की यह ग़ज़ल व्यक्तिगत प्रेम पर आधारित है यद्यपि ग़ज़ल का हर शेर स्वयं में
स्वतंत्र अर्थ रखता है | फिर भी पूरी ग़ज़ल में एक संगति है इसका सार इस प्रकार है |
1)... ग़ज़ल के पहले शेयर में शायर बता रहा है- प्रकृति में नए रस से परिपूर्ण होकर कलियों की
पंखुड़ियां धीरे-धीरे अपने कोमल गांठे खोल रही हैं, अर्थात कलियां खिल का फूल बनाने को तैयार हैं |
कोमल कलियों का धीरे-धीरे खिलकर फूल बनना ऐसा लगता है, मानो कलियां फूल बनकर खिलने और
आसमान में अपना रंग और सुगंध बिखेरने के लिए उड़ जाने को तैयार हैं | फूलों की कलियों में नवरस
छलकने लगा है | चारों ओर सुगंध फैलने लगी है |
2)... आकाश में झिलमिलाते सितारे जब उदय होते हैं, तो सारा संसार सो जाता है | चारों ओर सन्नाटा
पसर जाता है | रात का यह सन्नाटा भी कुछ बोलता लगता है | जैसे चुपके चुपके हमें बहुत कुछ कह रहा हो |
3)... अपने दर्द को व्यक्त करते हुए शायर अपने तथा अपनी किस्मत के संबंध में बताता कि हम दोनों
को रोने जैसा एक ही काम मिला है | हम दोनों एक दूसरे पर रो लेते हैं | यहां शायर खराब किस्मत को
कोसता है और अपने प्रिया को याद करके रोता है |
4)... शायर आगे कहता है, कि जो लोग मुझे बदनाम करने के लिए मेरी बातें करते हैं अर्थात मेरे बारे
में दूसरों को बताते हैं मेरे रहस्यों को प्रकट करते हैं | वह वास्तव में मुझे बदनाम नहीं कर रहे वह अपने
ही भेद खोल रहे हैं | अर्थात वह अपनी प्रकृति के बारे में बता रहे हैं कि वह कैसा है | अर्थात मुझे बदनाम
करने की बजाय वह स्वयं बदनाम हो रहे हैं |
5)... अपने प्रेम के कारण विवेक महान कवि को दीवानगी की हद तक जाना पड़ा है, क्योंकि बुद्धि विवेक
के साथ तेरे संबंध के बारे में जब वह सोचता है, तो तेरा सौदा करने वाले या तेरे हुसन को तोड़ने वाले तो
दीवाने हैं | अर्थात मेरा प्यार तो इन सब चीजों से ऊपर है |
6)... शायर के मन में विरह की पीड़ा भी है जो दुनियादारी का लिहाज भी है | इसलिए मैं तेरे बिछड़ने के
गम में चुपचाप रो लेता हूं ताकि किसी को हमारे प्रेम संबंधों का पता ना चले | अतः वह अपने दर्द को
चुपके चुपके रोकर प्रकट कर लेता है |
7)... सुंदरिया और इश्क की दुनिया की यह आदत है कि वह दोनों में संतुलन बनाए रखता है | जो
व्यक्ति हुस्न और इश्क में संतुलन रखते हैं | उतना ही पाते हैं, जितना स्वयं को उसमें खो देते हैं | अर्थात
जो जितना स्वयं को खो देता है उतना ही गहरा प्रेम को पाता है |
8)... शायर का हर एक शेर आंसुओं में डूबा हुआ है | आंखों की चमक दमक देखकर पता ही नहीं चलता
कि यह चमक शेरो शायरी के कारण आई है या आंसुओं के कारण क्योंकि दुनिया की चमक दमक के
बीच उनकी शायरी और विरह वेदना को महसूस करना जरूरी है |
9)... शराबियों की महफिल में जब तू ( प्रेयसी) याद आती है तो मन प्रसन्न हो उठता है | तेरी पवित्रता
देखकर फरिश्ते भी शर्म आ जाते हैं, अर्थात रात के सूने पैर में जब फरिश्ते गुनाहों का लेखा-जोखा देख
रहे होते हैं, तब कभी को शराब की महफिल में बैठ कर अपनी प्रेयसी की याद आती है |
10)... शायर की शायरी करने की प्रेरणा मीर तकी से मिली जिसके कारण में इतनी बेहतरीन शायरी
लिख सके अर्थात फ़िराक गोरखपुरी को इस बात का गर्व है | क्योंकि ग़ज़लों में भी मीर की ग़ज़ल ओं
का प्रभाव आ गया |
प्रश्न 1 - फ़िराक गोरखपुरी की ग़ज़ल वियोग शृंगार से कैसे संबंधित है स्पष्ट कीजिए?
उत्तर -
ग़ज़ल उर्दू शायरी की एक महत्वपूर्ण विद्या है | इसमें प्रेम तथा सिंगार को अत्यधिक महत्व दिया जाता है |
श्रृंगार दो प्रकार के होते हैं- वियोग तथा संयोग | वियोग श्रृंगार को बिरह भी कहते हैं फ़िराक गोरखपुरी की
इस ग़ज़ल में वियोग श्रृंगार का महत्व मिलता है | यह वियोग प्रेमिका के दूर रहने तथा प्रेम के कारण लोगों
द्वारा किए गए अपमान को सहने के कारण प्रकट हुआ है |
प्रश्न 2 - खुद का पर्दा खोलने से क्या आशय है ग़ज़ल पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए?
उत्तर -
खुद का पर्दा खोलने का आशा है अपने संबंध में अज्ञात बातों को बताना, भेद बताना | जब कोई व्यक्ति
किसी अन्य व्यक्ति की निंदा करता है, तो वह स्वयं अपनी निंदा करने की, बुराई करने की प्रवृत्ति को
उजागर करता है | इस प्रकार में स्वयं अपना भी तो पर्दा खोल रहा होता है |
शुभकामनाओं सहित !
नीलम
35-मॉडल, चंडीगढ़ |
35-मॉडल, चंडीगढ़ |
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