Sunday, July 28, 2019

Aroh Chapter 1 Poetry आरोह प्रथम अध्याय काव्य भाग

विद्यार्थियों

आज हम आरोह पुस्तिका का प्रथम अध्याय काव्य भाग -
 क) आत्मपरिचय  ख) एक गीत (कवि: हरिवंश राय बच्चन) करेंगे |

आत्मपरिचय

                                              कविता का सार
आत्मपरिचय में कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपने प्रेममय व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला है | मैं
जीवन के कर्तव्यों और दायित्वों के प्रति सचेत जीवन के कष्टों के बीच भी प्रेम को जीवित रखे
हुए हैं | उसका हृदय किसी के प्रेम से झंकृत है | उसी प्रिया के स्नेह में डूबा रहता है | लोग तो
सामाजिक समस्याओं में उलझे रहते हैं, किंतु मैं अपने मन की भावनाओं में मग्न रहता है | उसे
प्रेम के बिना यह संसार अधूरा लगता है | इसलिए वह एक नए स्वप्निल संसार की खोज में
रहता है |

कभी अपने हृदय को प्रेम की अग्नि से प्रदीप्त रखता है | उसी आज के सहारे जीवन के सुख
दुख सहता है | उसके मन में यौवन का नशा है | नशे में वियोग और निराशा भी घिर आती है इस
कारण उसका मन रोता है, किंतु होठों पर फिर भी हंसी खेलती है | वह प्रेम -भरी यादों को
अपनी पूंजी मानता है | कभी दुनियादारी और स्वार्थ के लिए जीने वालों को नादान कहता है |
वे स्वयं ऐसे सांसारिक ज्ञान को भूलना चाहता है | वह भावनाओं के संसार में जीना चाहता है |
इसलिए मैं भावना और कल्पना के सारे रोज नई दुनिया बनाता है | उस में दोष पाए जाने पर
वह स्वयं भी उसे मिटा डालता है |

वह सांसारिक वैभव वाली दुनिया को ठोकर मारता है | कवि को अपने रुदन में भी संगीत सुनाई
पड़ता है | उसके कोमल पानी में विद्रोह की आग है उसका प्रेम चाहे खंडहर जैसा टूटा फूटा है |
वह फिर भी मैं उसके लिए राजाओं के महल से भी अधिक महत्वपूर्ण है | कभी करूदन ही उसकी
कविता में छंद बनकर फूटा है | मैं सचमुच एक दीवाना है | उसके गीतों में मादकता है | उसी
मादकता से सारे संसार में प्रेम की मस्ती घोल देना चाहता है | 

प्रश्न 1 - आशय स्पष्ट कीजिए- ‘’मैं और, और जग और, कहां का नाता |’’
उत्तर -
" मैं और, और जग और, कहां का नाता " प्रस्तुत पंक्ति से कवि का आशय यह है कि संसार से
उसका संबंध चिर स्थाई नहीं है संपूर्ण विश्व भौतिकता वादी मानसिकता से ग्रसित है जबकि उसे यह
वैभव एवं समृद्धि तुच्छ लगती है इन्हीं विचार अभिनेताओं के कारण उसे लगता है कि इस जग में और
इसमें कोई समानता नहीं है | दोनों एक दूसरे से भिन्न है |

प्रश्न 2 - आत्म परिचय पाठ में शीतल वाणी में आग होने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर -
वाणी भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम है भावों का आवास ह्रदय है भाव कोमल एवं कठोर दोनों प्रकार
के हो सकते हैं कभी शांत भाव से कविता कर रहा है पर उसके अंदर अत्यधिक वैचारिक उथल-पुथल
है उसमें पर्याप्त आग छिपी हुई है कभी के सामान्य शब्दों में भी शक्ति क्षमता क्रांति की आग व्याप्त है
वास्तव में वह अपनी शीतल वाणी में ही जनमानस के सोए हुए हृदय को जागृत करने की शक्ति रखता
है इसी भाव को व्यक्त करते हुए कभी कहता है कि शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूं ऐसा कहकर
कवि ने विरोधाभास अलंकार का प्रदर्शन किया है |

प्रश्न 3 - नादान वही है हाय जहां पर दाना आत्मपरिचय कविता में बच्चन के इस कथन का कारण
और आशय  बताइए |
उत्तर -
नादान यानी मूर्ख व्यक्ति सांसारिक माया जाल में उलझ जाता है | और दाना का अर्थ है- बुद्धिमान और
समझदार | व्यक्ति कभी कहता कि संसार में समझदार और नासमझ दोनों तरह के लोग रहते हैं | जो
प्रत्येक कार्य सोच समझकर करते हैं वे दाना कहलाते हैं | जो बिना सोचे समझे कार्य करते हैं वे नादान
कहलाते हैं | कवि ने दोनों में अंतर बताया है |

प्रश्न 4 - कविता का शीर्षक आत्मपरिचय क्यों रखा गया अर्थात आत्म परिचय कविता के शीर्षक
की सार्थकता स्पष्ट कीजिए |
उत्तर -
आत्मपरिचय कविता में कवि स्वयं की अस्मिता को इस दुनिया के सामने प्रकट कर रहा है | उसका
ह्रदय प्यार बांटता है और संसार फिर से उस पर कटाक्ष करता है | अतः वह अपने दिल में आग लिए
घूम रहा है | अपने मन की हर बात कभी स्पष्ट रूप से कह रहा है | वह अपने भग्न स्वप्नों का खंडहर
ढो रहा है | अपनी संपूर्ण मादकता को लेकर घूम रहा है | इस प्रकार कविता की एक-एक पंक्ति
उनका परिचय दे रही है | अतः आत्मपरिचय शिक्षक सर्वथा उचित एवं सार्थक है |

प्रश्न 5 - कविता एक और जग जीवन का भार लिए घूमने की बात करती है और दूसरी और मैं
जग का ध्यान किया करता हूं विपरीत से लगते इन कथनों का क्या आशय है?
उत्तर -
आत्मपरिचय कविता की प्रथम पंक्ति में कवि कहता कि मैं जग जीवन का भार लिए फिरता हूं और
आगे चलकर कहता है मैं कभी ना जग का ध्यान किए करता हूं दोनों कथनों में विरोधाभास है | दोनों में
विरोधाभास इस बात का परिचायक है कि संसार में हमारा नाता वास्तव में प्रीति और कलह का है |
संसार का भार हमारे मन मस्तिष्क पर निश्चित रूप से पड़ता है |

दुनिया अपने व्यंग बानो और अपने तौर तरीकों तथा शासन प्रशासन में चाहे जितना कष्ट दे किंतु
इस दुनिया से जुड़े रहना मनुष्य की मजबूरी है | अपने समाज में पूरी तरह कट कर मनुष्य नहीं रह सकता
क्योंकि यही हमारा उत्साह और हमारी अस्मिता है | हमारा सब कुछ है कभी संसार इक्ता की प्रवृतियां
और जगत के व्यवहार से उभरे कष्ट के बाद उससे मु क्ति की आकांक्षा भी पालता है |

एक गीत

                                              कविता का सार
दिन जल्दी जल्दी ढलता है” कवि हरिवंश राय बच्चन के कविता संग्रह, “निशा निमंत्रण” से उद्धृत है |
इस गीत में प्रकृति के नित्य परिवर्तन होते रूपों में मनुष्य के धड़कते हृदय को सुनने का प्रयास किया
गया है | किसी प्रिय आलंबन या विषय से साक्षात्कार होने की आशा हमारे प्रयासों को गति प्रदान
करती है | अन्यथा हमें शिथिलता आ जाती है | समय बीतते जाने का एहसास हमें लक्ष्य प्राप्ति के
लिए प्रयास करने के लिए प्रेरित करता है | अपने विचारों को स्पष्ट करने के लिए कभी ने दो दृष्टांत
दिए हैं |

मार्ग पर चलने वाला राही यह सोचकर जल्दी-जल्दी अपनी मंजिल की ओर कदम बढ़ाता है, कि
कहीं रास्ते में ही रात ना हो जाए | इस बात से उसमें थकान में भी उत्साह का संचार होता है | उसकी
मंजिल अब दूर नहीं रही | लक्ष्य प्राप्ति की आशा और बीच मार्ग में रात होने का भय, थके हुए राही
को जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है | पक्षियों को भी दिन बीतने के साथ एहसास
होता है, कि उनके बच्चे कुछ पाने की आशा में घोंसलो से झांक रहे होंगे | यह सोचकर उनके पंखों
में गति आ जाती है, ताकि वे जल्दी से अपने बच्चों से मिल सके | 

कवि की स्थिति पथिक और पक्षियों से विपरीत है, क्योंकि उससे मिलने को कोई व्याकुल नहीं है |
इसलिए उसे घर पहुंचने की भी कोई जल्दी नहीं है | जब हृदय में किसी प्रकार की आशा अथवा
उत्साह ना हो तो पैरों की गति में शिथिलता आ जाती है | कवि को न तो मार्ग में ही रात होने का
भय है, न लक्ष्य- प्राप्ति की चिंता ,इसलिए वह शिथिल है | किंतु फिर भी  कवि को लगता है कि
दिन बहुत जल्दी जल्दी बीत जाता है अर्थात जीवन में समय अत्यंत तेज गति से बीत जाता है |

प्रश्न 1 - दिन जल्दी जल्दी ढलता है कविता का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए |
उत्तर -
इस कविता में कवि में प्रेम की व्यग्रता और व्याकुलता को व्यक्त किया है पथिक को अपने प्रिय जनों
से जल्दी मिलने की इच्छा है | इसलिए वह जल्दी जल्दी चलने का प्रयास करता है इस प्रकार अपने
बच्चों को के विषय में सोच कर पक्षियों के  परों में गति आ जाती है | वह जल्दी-से-जल्दी अपने  नीड़ो
की ओर लौटना चाहते हैं जबकि कवि अकेला है किसी को उसकी प्रतीक्षा नहीं है इसीलिए कवि के
कदमों में शिथिलता तथा मन में व्याकुलता है यहां कवि मानता है कि जीवन की गति में तीव्रता का
कारण प्रेम है |

प्रश्न 2 - दिन जल्दी-जल्दी ढलता है कविता में कभी अपने घर की ओर लौटने में शिथिल और 
अनु उत्साहित क्यों है?
उत्तर -
कवि कहता है कि दिन ढलने पर जब वह घर की ओर कदम बढ़ाता है तो उसे यह देखकर सुखद
अनुभूति होती है कि अपने-अपने प्रतीक्षारत परिजनों से मिलने के लिए व्याकुल जीव थकावट के बावजूद
भी कितनी सुरती से घर की ओर जा रहा है उसके मन में विचार उठता है कि उसकी प्रतीक्षा तो कोई
नहीं करता उसके लिए तो कोई व्याकुल नहीं होता इस विचार के मन में आते ही उसकी गति शिथिल हो
जाती है और मैं धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए अपने घर की ओर अग्रसर होता है |

प्रश्न 3 - दिन जल्दी जल्दी ढलता है कि आवृत्ति से कविता की किस विशेषता का पता चलता है?
उत्तर -
रात के आगमन की अनुभूति से सभी पंथी अपने अपने घरों की ओर तेजी से लौट रहे हैं सभी के घरों में
उनका प्रतीक्षा के लिए कोई ना कोई अपना प्रिय जन यात्री भी व्याकुल रहता है कोई हमारी प्रतीक्षा कर
रहा है यही बात घर पहुंचने के लिए उनके कदमों की गति बढ़ा देती है लेकिन दुख की बात यह है कि
कवि के इंतजार में पलकें बिछाए कोई नहीं बैठा है यही तथ्य याद आने पर कवि की घर लौटने की
इच्छा शिथिल हो जाती है किसी का उसके प्रतीक्षारत ना होना उसे व्याकुल कर देता है |

प्रश्न 4 - बच्चे किस बात की आशा से नीडो से जाग रहे होंगे?
उत्तर -
बच्चे अर्थात चिड़िया के शिशु अपने चिड़िया के शिशु अपने नीडो से निकल कर अपने माता-पिता की
प्रतीक्षा करते हैं जो उनके लिए भोजन एवं स्नेह लेकर लौटते है | बच्चे आशावादी होते हैं वे दाना पाने
और अपनी मां के शीघ्र लौटाने की आस लिए नीडो से झांक रहे होंगे | वे सुबह से शाम तक आशा एवं
धैर्य के साथ अपने लिए स्नेह एवं भोजन की प्रतीक्षा करते हैं |

शुभकामनाओं सहित !

नीलम
35-मॉडल, चंडीगढ़ |

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