Tuesday, April 28, 2020

Aroh Chapter 3 Poetry आरोह तृतीय अध्याय काव्य भाग

विद्यार्थियों


आज हम आरोह पुस्तिका का तृतीय अध्याय करेंगे, जिसमें दो कविताएं हैं -
1) कविता के बहाने
2) बात सीधी थी पर
(कवि -  कुंवर नारायण)
                                          कविता के बहाने


                                              कविता का सार
कविता के बहाने कविता में कविता की शक्ति पर प्रकाश डाला गया है | कवि का कहना है कि
कविता में चिड़िया की उड़ान, फूलों की मुस्कान और बच्चों की क्रीडा तीनों का समावेश है | यह
तीनों अपने आप में सुंदर होते हुए भी सीमित है, परंतु कविता का क्षेत्र असीमित है | उसके अंतर्गत
जड़ -चेतन, पशु-पक्षी, मनुष्य आदि सभी का व्याप  हो सकता है |


1) चिड़िया की उड़ान सीमित है | पर कविता की उड़ान तो और असीमित है भला चिड़िया की
उड़ान कविता जैसी कैसे हो सकती है?
2) कविता का खिलना फूल के खिलने का बहाना तो हो सकता है | पर फूल का खिलना कविता
जैसा नहीं हो सकता फूल तो खिलता है और फिर कुछ ही देर बाद मुरझा जाता है | लेकिन कविता
तो भावों की महक लेकर बिना मुरझाए  सदैव प्रभाव डालती ही रहती है |
3) कविता तो बच्चों के खेल के समान है जिसकी कोई सीमा नहीं है जैसे बच्चों के सपने की कोई
सीमा नहीं वे भविष्य की ओर उड़ान भरते हैं | वैसे ही कविता भी शब्दों का ऐसा अनूठा खेल है |
जिस पर कोई बंधन नहीं कविता का क्षेत्र सीमा रहित है | 


प्रश्न 1 - इस कविता के बहाने बताएं कि “सब घर एक कर देने के माने” क्या है ?
उत्तर -
सब घर एक कर देने के माने से अभिप्राय है | सभी घरों को एक समान समझना अपना पराया
छोटा बड़ा तेरा मेरा जाति धर्म संप्रदाय आदि संकुचित भावनाओं को मिटा कर, सब को एक समान
देखना | समाज में छोटे बच्चे का मन बहुत कोमल होता है | उसे किसी से भेदभाव ईर्ष्या द्वेष आदि
नहीं होता इसलिए अपने साथियों के साथ खेलने के लिए सभी घरों में जाता है | वह समस्त
संकीर्णता ओं को मिटाकर सभी घरों को एक समान कर देता है | 


प्रश्न 2 - उड़ने और खेलने का कविता से क्या संबंध बनता है?
उत्तर -
उड़ने और खेलने का कविता से सीधा संबंध है | कवि की कविता में भी कल्पना की उड़ान होती
है | कवि की उड़ान पक्षियों की उड़ान से भी अधिक ऊंची होती है | इसलिए कहा भी गया है :-
                                   जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि 
खिलने का संबंध फूल से है उसकी सुंदरता और उसकी मधुर गंध से है | फूल तू कुछ समय के
लिए खेलकर अपना रंग रूप प्रकट करता है | गंद फैलाता है, और फिर मुरझा जाता है | लेकिन
कविता तो युग युगांतर तक अपने गुण रूपी सुगंध को फैलाने की क्षमता रखती है | कवि के
प्रतीकात्मक प्रयोग से उड़ने और खेलने को अति व्यापकता प्रदान कर दी है, और यह शाश्वत गुणों
को व्यक्त करने वाले वाहक बन गए हैं |


प्रश्न 3 - कविता और बच्चे को समानांतर रखने के क्या कारण हो सकते हैं? 
उत्तर -
कवि ने बच्चों और कविता को समानांतर रखा है | क्योंकि बच्चों में रचनात्मक ऊर्जा होती हैं |
उनके खेलों की कोई सीमा निश्चित नहीं होती | उनके खेल में अनेक उपकरण होते हैं | इसी प्रकार
कविता में भी रचनात्मक ऊर्जा होती है, और रचनात्मक ऊर्जा होने के कारण सीमाओं के बंधन से
परे है | कविता का क्षेत्र भी और सीमित है कवि की कल्पना में अद्भुत क्षमता होती है | 


प्रश्न 4 - कविता के संदर्भ में बिना मुरझाए महकने के माने क्या होते हैं? 
उत्तर -
फूल थोड़े समय तक खेलकर अपनी सुगंध फैला कर आनंद देते हैं, जबकि कविता कभी नहीं मुड़
जाती, उसमें व्यक्त भाव सदैव आनंद देते हैं | कविता की सुगंध सदा ही बनी रहती है | वह फूलों
की तरह मुरझा कर नष्ट नहीं होती, इसलिए फूल बिना मुरझाए सुगंध फैलाने का अर्थ नहीं जान
पाते |


प्रश्न 5 - कविता के बहाने कविता के संदर्भ में चिड़िया एवं कविता के बीच संबंध का आधार
स्पष्ट कीजिए?
उत्तर -
कविता के बहाने” कविता में, कविता के लिए चिड़िया के बहाने उड़ान भरने जैसी विशेषता को
रेखांकित किया गया है | इसका धारियां क्यों उड़ान मूल रूप में चिड़िया के द्वारा ही भरी जाती है |
यह एक क्रिया है जो चिड़िया के उन्मुक्त नैसर्गिक स्वभाव को परिचित करती है | परंतु कवि ने इसे
कल्पना के रूप में मानसिक उड़ान मानकर कविता से जोड़ दिया | चिड़िया की उड़ान का वर्णन कविता
कर सकती है, लेकिन कविता की उड़ान को चिड़िया नहीं जान सकती | इस प्रकार चिड़िया और
कविता को एक दूसरे से जुड़कर कविता की उड़ान को श्रेष्ठ सिद्ध किया गया है |


                                           बात सीधी थी पर


                                              कविता का सार
बात सीधी थी, पर मैं भाषा की सरलता सहजता को रेखांकित किया गया है | कवि का कहना कि
हमें बात हिंदी सरल बात को सीधे सरल शब्दों में कहने का प्रयास करना चाहिए | कविता का कथन
सरल था किंतु उसे अभिव्यक्त करने मैं वह भाषा के जाल में फस कर थोड़ा सा पेचीदा हो गया |
उसे पाने के प्रयास में भाषा को उलटा- पलटा, तोड़ा -मरोड़ा, घुमाया- फिराया कि जो कुछ हम कहना
चाहते हैं | वह अभिव्यक्त हो | उसका सही सामंजस्य हो इसके लिए काफी प्रयास किया परंतु बात
नहीं बनी | इस प्रयास में के साथ-साथ भाषा और भी कठिन होती चली गई और समझे कथ्य और
भाषा को बुरी तरह से  चला जा रहा है | भाषा को धैर्य बनाने और उसे अचरज में डालने वाले काम
पर कवि को तमाशबीनओ द्वारा दी जा रही | शाबाशी और वाह-वाह की आवाज सुनाई दे रही थी
इसलिए कथ्य और भाषा को जोड़ने का काम और जोर लगा कर कर रहा था |


अंत में वही हुआ जिसका कवि को भय था, जोर-जबर्दस्ती से भाषा को व्यक्त करने के कारण, जब
कथन में कसावट नहीं रही, तो थक कर उसे सहज और स्पष्ट करने की अपेक्षा जबरदस्ती कील की
तरह ठोक दिया |अर्थात कथ्य को प्रभावहीन हो जाने दिया | वह कविता ऊपर से तो ठीक-ठाक
दिखाई देती थी, पर आंतरिक रूप से कथ्य और भाषा में सही सामंजस्य नहीं था | कथ्य में ना तो
कसावट थी और ना ही शक्ति | कथ्य कवि से एक शरारती बच्चे की तरह खेल रहा था | जिस प्रकार
खेल में बच्चा पकड़ में नहीं आता, उसी प्रकार  बात कवि की पकड़ में नहीं आ रही थी | बांटने और
भाषा में कवि को पसीना पहुंचते देखकर पूछा क्या उसने भाषा को आसानी से प्रयोग करना कभी
नहीं सीखा? क्या कभी को भाषा का ठीक ढंग से प्रयोग करना नहीं आता | वास्तव में अच्छी कविता
की रचना से सही बात का सही शब्द से जोड़ना आवश्यक है, और जब ऐसा होता है तो अतिरिक्त
परिश्रम की आवश्यकता नहीं होती, कविता की रचना आसानी से हो जाती है |


प्रश्न 1 - बात सीधी थी पर कविता के आधार पर बताइए कि भाषा को सहूलियत से बरतने
का क्या अभिप्राय है?
उत्तर -
भाषा को सहूलियत से बचने का अभिप्राय है - भाषा एवं स्वभाविक ढंग से प्रयोग में लाना तथा
काव्य को प्रभावशाली अभिव्यक्ति देना | व्यर्थ का शब्द जाल बुनने से लेखक को लिखने एवं पाठक
को समझने में कठिनाई होती है | अपनी भावनाओं एवं विचारों को सटीक ढंग से अभिव्यक्त करने के
लिएउपयुक्त शब्द एवं भाषा की आवश्यकता होती है | अंबर पूर्ण एवं अनावश्यक शब्दों में भाषा के
प्रयोग से परहेज रखना आवश्यक है | भाषा को सहूलियत से प्रयुक्त करने पर ही रचना भी सहजता
से अपना अर्थ संप्रेषित करने में समर्थ होती है |


प्रश्न 2 - “बात सीधी थी पर” कविता में कवि क्यों परेशान है? उसके साथ कौन किस प्रकार
खेल रहा है?
उत्तर -
बात सीधी थी पर” कविता में कवि भाषा के चक्कर में पड़ने के कारण बात के दूरूह और निर
उद्देश्य हो जाने से परेशान है | उसने बात की सार्थकता को बचाए रखने के लिए भाषा को उलटा-पलटा,
तोड़ा-मरोड़ा लेकिन भाषा कठिन होती चली गई अतः बात की चूड़ी ही मर गई | अर्थात का महत्व 
समाप्त हो गया और उसने बात को कील की तरह वही ठोक दिया | इस कविता में कवि के साथ बात
शरारती बच्चे की तरह खेल रही है | कभी चाहता है कि बात रूपी पेज को इतना नहीं घूम आना चाहिए
कि उसकी चूड़ी रूपी भावना ही नष्ट हो जाए |


प्रश्न 3 - "बात सीधी थी पर" का संदेश / उद्देश्य / प्रतिपाद्य/ काव्य स्पष्ट कीजिए |
उत्तर -
बात सीधी थी पर” कविता का मूल संदेश यह है कि हर बात को सहजता से कहना चाहिए यदि
वक्ता अपनी बात को बनावट, जटिलता, वक्रता या चमत्कार प्रदर्शन के बिना कह दे तो बात बन जाती
है | भाव पूरी तरह श्रोता तक पहुंच जाता है परंतु यदि वक्त अपनी बात को चमत्कारी बनाने के फेर में
शब्दों को जानबूझकर तोड़ता-मरोड़ता है या कठिन बनाता है तो बात बीच में ही रह जाती है | बात का
प्रभाव और सौंदर्य नष्ट हो जाता है | बात अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है, जिसका  उदाहरण पेंच
के माध्यम से दिया है |


प्रश्न 4 - बात पेचीदा होने पर भी कभी पेंच को और अधिक क्यों करता गया?
उत्तर -
भाषा का जादू दिखाने के चक्कर में अभिव्यक्ति पेचीदा होती गई | फिर भी कभी भाषा के पेंच को 
कस्ता चला गया | कारण था, जनता का समर्थन | उसे तमाशबीनो की वाहवाही मिलने लगी | यद्यपि
वह अस्पष्ट था, गलत था | वह गलत बात पर अड़ गया था | बात उलझ गई थी | फिर भी उसके
अंध समर्थकों ने उसे समर्थन देना जारी रखा | परिणाम यह हुआ कि यह बात को सुलझाने की बजाय
उलझी हुई बात को और उलझा दिया


शुभकामनाओं सहित !

नीलम
35-मॉडल, चंडीगढ़ |

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