Sunday, May 31, 2020

Aroh Chapter 4 Literature आरोह चतुर्थ अध्याय गद्य भाग

विद्यार्थियों!

आज हम आरोह पुस्तिका का चतुर्थ अध्याय
गद्य भाग -
पहलवान की ढोलक (लेखक: फणीश्वर नाथ रेनू ) करेंगे |


प्रश्न 1 - पहलवान की ढोलक के किस किस मोड़ पर लुट्टन के जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए?
उत्तर - 
लुट्टन पहलवान का जीवन उतार-चढ़ाव से भरपूर रहा | 9 वर्ष की आयु में उसके माता पिता चल बसे | सास न
हीं पाल पोस कर बड़ा किया | बचपन में गाय चराता, दूध पीता और सास को दुख देने वाले वालों
से बदला लेने के लिए शरीर को सुडौल बनाता | सबसे पहले उसने चांद सिंह को हराकर राजकीय
पहलवान का दर्जा प्राप्त किया | काले खा पहलवान को हराकर प्रसिद्धि प्राप्त की | उसकी सास
और पत्नी का स्वर्गवास हो गया | वे 15 वर्षों तक राज दरबार का अजय पहलवान रहा | अपने
दोनों बेटों को भी उसने राजकीय पहलवान बना दिया | राजा की मृत्यु पर उस पर दुखों का पहाड़
टूट पड़ा | विलायत से राजकुमार ने आकर सारी व्यवस्था बदल डाली | उसे और उसके बेटों को
राज दरबार से निकाल दिया | गांव में पहलवान के बेटे मजदूरी करके जो कुछ लाते उसी से गुजारा
होता | गांव में फैली महामारी में पहलवान के दोनों बेटे चल बसे | एक दिन पहलवान भी चल बसा |
इस प्रकार पहलवान का अंत बड़ा ही दुखद हुआ | 

प्रश्न 2 - लुट्टन पहलवान ने ऐसा क्यों कहा कि मेरा कोई गुरु पहलवान नहीं, यही ढोल है ?
उत्तर -
लुट्टन  ने कुश्ती के दाव पेच किसी से नहीं सीखें | ना हीं उसका लक्ष्य एक पहलवान बनना था | 
वह तो बचपन में गाय चराता हुआ, गायों के धार का गर्म दूध पिया करता था | इसी से उसका
शरीर  हट्टा कट्टा हो गया था | मैं लोगों से बदला लेने के लिए कसरत करता था | एक बार जब
श्याम नगर में वह मेला देखने गया, तो वहां के दंगल में ढोल बज रहा था | पहलवान कुश्ती कर
रहे थे | अचानक ही वह पहलवान से लड़ने हेतु अखाड़े में कूद पड़ा और अंत में उसने ढोल से
प्रेरणा लेते हुए प्रसिद्ध चांद सिंह पहलवान को हरा दिया |

प्रश्न 3 - गांव में महामारी फैलने और बेटों के देहांत के बावजूद पहलवान ढोल क्यों बजाता रहा?
उत्तर -
जब महामारी फैली, तो सारा गांव  हैजा और मलेरिया से ग्रस्त हो गया | चारों ओर हाहाकार मचा
हुआ था | घर के घर खाली हो गए थे | रात्रि की विभीषिका में चारों ओर सन्नाटा छाया रहता था |
रात्रि की उसी विभीषिका को तोड़ने के लिए लोगों में जीने की उमंग पैदा करने के लिए लुट्टन 
पहलवान ढोल बजाता था | जब उसके दोनों बेटे महामारी की चपेट में आ गए तो, वह असहाय
वेदना में बिलखते हुए उससे कहने लगा कि बाबा उठा पटक दो वाला ताल और चटक - चटक -
चट- ध ताल बजाओ  तो लुट्टन सारी रात में ताल बजाता रहा सुबह होते ही उसके दोनों बेटों की
मृत्यु हो गई | अतः अपने बेटों की अंतिम इच्छा को पूरा करने के लिए उनके देहांत के बावजूद भी
लुट्टन पहलवान ढोल बजाता रहा |

प्रश्न 4 - ढोल की आवाज का पूरे गांव पर क्या असर होता था?
उत्तर -
ढोलक की आवाज पूरे गांव के लिए संजीवनी शक्ति का काम करती थी | महामारी के कारण
आत्माओं की अकाल मृत्यु से निराश उदास ग्रामीणों के मन में आशा की भावना पैदा करती थी |
उन्हें परिस्थितियों से लड़ने की प्रेरणा देती थी | उनके मन में जिजीविषा उत्पन्न हो जाती थी | 
ढोल की आवाज सुनकर बूढ़े, बच्चे, जवानों  की आंखों में चमक भर देती थी | स्पंदन हीन और
शक्तिहीन रंगों में अचानक बिजली की तरह खून बढ़ने लगता था | 

प्रश्न 5 - पहलवान की ढोलक कहानी में पंक्ति कफन की क्या जरूरत है से क्या अभिप्राय है?
उत्तर -
फणीश्वर नाथ रेणु की पहलवान की ढोलक कहानी में लेखक ने गांव की चिर परिचित अवस्था
का भावपूर्ण चित्रण किया है | जिसमें गांव मासी अपनी भावनाओं से एक दूसरे की सहायता कर
पाते हैं क्योंकि वे आर्थिक रूप में इतने समर्थ नहीं होते कि किसी की आर्थिक सहायता कर सकें |
जब महामारी से विभिन्न घरों में 12 लाख से लगातार निकलनी शुरू हो गई तो वे मानसिक और
आर्थिक रूप से इतने टूट गए कि कफन तक के लिए प्रबंध करने का मुश्किल होने लगी | उन्हें
कफन का प्रबंध के लिए सोचना पड़ रहा था | यही कारण है कि गांव वाले अपने पड़ोसियों को
बिना कफन के ही लाशों को पानी में बहा देने का सुझाव देने लगे क्योंकि सभी की आर्थिक स्थिति
अत्यधिक दयनीय हो गई थी |

प्रश्न 6 - पहलवान का बचपन कैसा था ?
उत्तर -
लुट्टन पहलवान जब 9 वर्ष का था तभी उसके माता पिता स्वर्ग सिधार गए थे | किंतु भाग्य ने उसका
साथ दिया और छोटी उम्र में ही उसकी शादी हो गई | विधवा सास ने उसे पुत्र की तरह पाल पोस कर
बड़ा किया बचपन में उसका समय गाय चराने दूध पीने और कसरत करने में भी बीतता था | गांव
वाली उसकी सास को सताया करते थे| इसी कारण लोगों से बदला लेने के भावना से ही वह कसरत
करने की और उत्कृष्ट हुआ था | नियति रूप से खूब कसरत करने से किशोरावस्था में ही वह गठीला
शरीर वाला बन गया था |

प्रश्न 7 - पहलवान की ढोलक पाठ में राजा के द्वारा लुट्टन सिंह पुकारे जाने पर किस-किस ने
आपत्ति की और क्यों तब राजा ने क्या किया?
उत्तर -
श्याम नगर के दंगल में जब नूतन ने उस क्षेत्र के प्रसिद्ध पहलवान चांद सिंह को प्राप्त कर दिया |
तब राजा साहब ने उसे सम्मान देते हुए लुट्टन सिंह कहकर पुकारा इस पर राज पंडितों ने आपत्ति
व्यक्त की क्योंकि लुट्टन उच्च जाति कुल का सदस्य ना था | जिसे क्षत्रियों की उपाधि सिंह उपनाम
से पुकारा जाए | मैनेजर साहब, जो स्वयं क्षत्रिय थे, ने तो यहां तक कह दिया कि यह तो सरासर
अन्याय है | राजा ने यह कहकर उनका प्रतिकार किया कि उसने लुट्टन यानी क्षत्रिय का काम किया है |

प्रश्न 8 - पहलवान की ढोलक कहानी में लुट्टन सिंह ने अचानक बिना कुछ सोचे समझे दंगल
में चांद सिंह को कुश्ती के लिए चुनौती क्यों दे दी?
उत्तर -
लुट्टन सिंह बचपन से अनाथ की तरह पाला था | जिस मां समान सांस के यहां उसने अपना सारा
बचपन बिताया था | उसको गांववासी किसी ना किसी बात पर परेशान किया करते थे | उन सभी को
उसने कसरत के द्वारा कसे हुए शरीर से भयभीत कर दिया था | इसके अतिरिक्त में एक दृढ़ निश्चय
व्यक्तित्व वाला व्यक्ति था | उसी जवानी वे निश्चय व्यक्तित्व हिम्मत और ढोल की ललकारती हुई |
थाप ने उसकी सोचने की शक्ति को बिजली की शक्ति में परिवर्तित कर दिया था | अतः उसने चांद
सिंह को कुश्ती में चुनौती दे दी |

प्रश्न 9 - लुट्टन सिंह पहलवान का चरित्र चित्रण कीजिए ?
उत्तर -
i) व्यक्तित्व : लुट्टन सिंह पहलवान का वास्तविक नाम लुट्टन सिंह था | पहलवान उसके नाम में बाद
में जुड़ा जब वह लंबा चौड़ा और अस्त-व्यस्त पगड़ी बांध तथा अपने माता-पिता की इकलौती संतान
था | 9 वर्ष की आयु में भी उसके माता-पिता उसे छोड़कर स्वर्ग सिधार गए|  सौभाग्य वेर्सुस की
बचपन में ही शादी हो गई थी | अतः उसका पालन-पोषण उसकी विधवा सास ने किया लुट्टन
पहलवान के दो बेटे थे | 
ii) साहसी : लुट्टन सिंह अत्यंत साहसी पहलवान था | व सुडौल और हटा कटा था | प्रत्येक परिस्थिति
का डटकर सामना करता था | मैं कभी घबराता नहीं था | अपने साहस के बल पर उसने चांद सिंह
पहलवान को हराया था | महामारी फैलने के कारण जब रात्रि की विभिन्न विभीषिका से सारा गांव
थर थर कांप था | तब लुट्टन  सिंह अकेला सारी रात ढोलक बजाता था और सब के साहस का
प्रत्यक्ष प्रमाण था | 
iii) भाग्य हीन : लुट्टन  सिंह साहसी होने पर भी भाग्य ही नहीं था | बचपन में 9 वर्ष में उसकी
माता-पिता उसे छोड़ कर चले गए | सास ने उसे पाला बाद में उसके दोनों बेटे भी काल का शिकार
हो गए | जिस वीरता के बलबूते पर वह श्याम नगर का राज पहलवान बना था | राजा की मृत्यु
के बाद व्यापारी उसे छोड़ना पड़ा | 
iv) निडर : लुट्टन  सिंह एक निडर पुरुष था | सारागांव महामारी के कारण बाधित होकर अपनी
झोपड़ियों में गुम हो जाता|  तब अकेला लोटन सिंह रात्रि के सन्नाटे में निडरता से अपना ढोल
बजाया करता था | श्याम नगर के दंगल में भी वह चांद सिंह  जैसे प्रसिद्ध पहलवान के साथ लड़ते
हुए नहीं डरा | राजा के मना करने पर भी उसने निडरता से चांद सिंह के साथ कुश्ती की | अंत में
से हराया पहलवान को दंगल में हराना ही उसका निडरता का उदाहरण है |
v) सहयोगी : लुट्टन सिंह पहलवान होने के साथ-साथ एक संवेदनशील व्यक्ति भी था | वे दुख सुख
में सभी गांव वालों का साथ देता था | महामारी में भी जब कहर मचा हुआ था | तो वह लोगों को
जीने की उमंग पैदा करने के लिए सारी रात ढोल बजाया करता था | दिन में वह घर घर जाकर
अपने पड़ोसियों और गांव वालों का हाल चाल पूछ कर उन्हें धैर्य देता था |  

शुभकामनाओं सहित !

नीलम
35-मॉडल, चंडीगढ़ |

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